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    अच्छे-अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते हैं :रिश्ते बड़े अनमोल होते हैं।




    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 

         
    बलिया उत्तरप्रदेश:---सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में  जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था । एक चार पट्टी के कमरे को लेकर विवाद गहराता जा रहा था। 

    एक दिन दोनो भाई मरने-मारने पर उतारू हो गये, तो ...
    पिताजी बहुत जोर से हँसे । पिताजी को हँसता देखकर ...दोनों भाई लड़ाई को भूल गये, और पिताजी से हँसी का कारण पूछा। 

      पिताजी ने कहा  इस छोटे से ज़मीन के टुकडे के लिये  इतना लड़ रहे हो ? छोड़ो इसे ... आओ मेरे साथ,  मैं तुम्हें एक अनमोल खजाना बताता हूँ।

     पिताजी और दोनों पुत्र  पवन और मदन रवाना हुये। पिताजी ने कहा  देखो ! यदि तुम आपस में लड़े, तो फिर मैं तुम्हें उस खजाने तक लेकर नहीं जाऊँगा, बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा। 

    तब दोनो पुत्रों ने  खजाने के चक्कर में एक समझौता किया कि  चाहे कुछ भी हो जाये, पर हम आपस में लड़ेंगे नहीं । गंतव्य तक जाने के लिये एक बस मिली, पर सीट दो की मिली, और वो तीन थे। अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठा, तो थोड़ी देर मदन  ऐसे चलते-चलते लगभग  दस घण्टे का सफर तय किया । 

    फिर गाँव आया। घनश्याम दोनों पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये। हवेली चारों तरफ से सुनसान थी। सेठ घनश्याम ने जब देखा कि हवेली में जगह-जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है, तो वे  वहीं पर बैठकर रोने लगे । 

    दोनों पुत्रों ने पूछा क्या हुआ पिताजी ! आप रो क्यों रहे हैं ? 

    रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा जरा ध्यान से देखो ... इस घर को। याद करो वो बचपन जो तुमने  यहाँ बिताया था। 
    तुम्हें याद है इस हवेली के लिये मैंने अपने भाई से बहुत लड़ाई की थी, सो ये हवेली तो मुझे मिल गई, पर उस भाई को मैंने हमेशा के लिये खो दिया, क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया। 
    फिर वक्त्त बदला, और एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा।

     अच्छा तुम ये बताओ बेटा  कि जिस सीट पर हम बैठकर आये थे,  क्या वो बस की सीट हमें मिल जायेगी ? और ... यदि मिल भी जाये, तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो सकती है ? मतलब कि उस सीट पर हमारे सिवा  कोई और न बैठे !

    तो दोनों पुत्रों ने एक साथ कहा कि  ऐसा कैसे हो सकता है,  बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती हैं। पहले कोई और बैठा था आज कोई और बैठा होगा और  पता नहीं कल कोई और बैठेगा और वैसे भी उस सीट में क्या है, जो सिर्फ थोड़ी सी देर की यात्रा के लिये हमारी हुई थी। 

    पिताजी पहले हँसे, फिर रोये और फिर बोले, देखो ! यही तो मैं तुम्हें समझा रहा हूँ, कि जो थोड़ी देर के लिये तुम्हारा है, तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था, बस थोड़ी सी देर के लिये तुम हो, और थोड़ी देर बाद  कोई और हो जायेगा । 

    बस बेटा ! एक बात ध्यान रखना कि थोड़ी सी देर के लिये कहीं अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना। 
    यदि कोई प्रलोभन आये, तो इस घर की इस स्थिति को देख लेना कि अच्छे-अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोसला बना लेते हैं। 

    बस बेटा ! मुझे यही कहना था कि बस की उस सीट को याद कर लेना जिसकी रोज सवारियाँ बदलती रहती हैं । उस सीट के लिये अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना। 

    जिस तरह से बस की यात्रा में  तालमेल बिठाया था बिल्कुल वैसे ही जीवन की यात्रा में भी तालमेल बिठा लेना! 

    दोनों पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये और पिता के चरणों में गिरकर रोने लगे। 


    मित्रों ! रिश्ते बड़े अनमोल होते हैं।
     
     थोड़े से ऐश्वर्य या सम्पदा के फेर में.. कहीं किसी ...
       अनमोल रिश्ते को खो न देना.."जो प्राप्त है,पर्याप्त है "

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