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    इन्द्रदर्पहारिणी भगवती आदिशक्ति का अभ्युदय कहानी: SKGupta


    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
    बलिया उत्तरप्रदेश:--एक समयकी बात है, मदाभिमानी दैत्यों और देवताओंके बीच भयंकर युद्ध हुआ। यह विस्मयकारक युद्ध लगातार सौ वर्षोंतक चलता रहा। उस समय देवताओंपर भगवती आदिशक्ति कृपालु थीं, अतः देवताओंकी इस महासंग्राममें विजय हुई। दानव पराजित होकर पृथ्वी और स्वर्गको छोड़कर पाताललोकमें चले गये। दैत्योंके पराजित हो जानेपर देवताओंके मनमें अपार हर्ष हुआ। वे विजयके मदमें चूर होकर सर्वत्र अपने पराक्रमका बखान करने लगे।

    देवताओंपर परम अनुग्रह करने तथा उनके अहङ्कारको नष्ट करनेके लिये भगवती आदिशक्ति उनके समक्ष यक्षके रूपमें प्रकट हुईं। उनका विग्रह करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान था। देवराज इन्द्रने अग्निको उस तेजस्वी यक्षका परिचय जाननेके लिये भेजा। अग्निदेव इन्द्रके आदेशसे यक्षके पास पहुँचे। यक्षने अग्निसे कहा— 'मेरा परिचय जाननेके पूर्व तुम अपना परिचय देनेकी कृपा करो। पहले यह बताओ कि तुम कौन हो और तुममें क्या पराक्रम है ?' इसपर अग्निने कहा— 'मैं जातवेदा अग्निदेव हूँ। अखिल विश्वको जला डालनेकी मुझमें शक्ति है।'

    अग्निके इस प्रकार कहनेपर यक्षने उनके सामने एक तृण रख दिया और कहा— 'यदि विश्वको जला डालनेकी तुममें शक्ति है तो पहले इस तृणको जलाकर दिखाओ।' अग्निदेवने उस तृणको भस्म करनेके लिये अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा दी, किंतु उसे भस्म न कर सके। अन्तमें लज्जित होकर वे इन्द्रके पास लौट गये और उनसे वहाँका सारा समाचार बताया। तदनन्तर देवराज इन्द्रने वायुको बुलाया और कहा— 'वायुदेव ! तुमसे यह सारा जगत् ओतप्रोत है। तुम्हारी चेष्टासे ही संसार सचेष्ट बना हुआ है। तुम ही प्राणरूप होकर अखिल प्राणियोंका संचालन करते हो। अतः अब तुम ही जाकर इस यक्षका पता लगाओ।'

     इन्द्रको अपनी प्रशंसा करते देखकर वायुदेव अभिमानसे भर गये। वे तुरन्त यक्षके सन्निकट गये। उन्होंने यक्षसे कहा— 'मैं मातरिश्वा हूँ। मुझे लोग वायुदेव कहते हैं। मेरी चेष्टासे ही जगत्‌के सम्पूर्ण व्यापार चलते हैं।' यक्षने उनसे भी एक तृणको उड़ानेके लिये कहा और वायु अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगानेके बाद उस तृणको हिला भी न सके तथा वे भी लज्जित होकर इन्द्रके पास लौट गये।

    सम्पूर्ण देवताओंने इन्द्रसे कहा— 'देवराज आप हमलोगोंके स्वामी हैं, अतः यक्षके सम्बन्धमें पूरी जानकारी प्राप्त करनेके लिये अब आप ही प्रयत्न करें।' अन्तमें देवराज इन्द्र अभिमानसे यक्षके सन्निकट गये, किंतु तेजस्वी यक्ष उसी क्षण अन्तर्धान हो गया। देवराज इन्द्र इस घटनाको देखकर लज्जासे डूब गये। वे यक्षका परिचय जाननेके लिये भगवतीके मायाबीजका जप और ध्यान करने लगे। उनका अभिमान नष्ट हो गया। तदनन्तर, वर, पाश, अंकुश और अभय मुद्रा धारण किये हुए भगवती आदिशक्तिने उन्हें दर्शन दिया। भगवतीका दर्शन प्राप्त करके इन्द्र कृतज्ञतासे भर गये। उन्होंने करुण स्वरमें भगवतीकी नाना प्रकारसे स्तुति की और यक्षका परिचय बतानेकी प्रार्थना की। भगवतीने इन्द्रसे कहा— 'देवराज ! मेरी ही शक्तिसे तुमलोगोंने दैत्योंपर विजय प्राप्त किया है। तुमलोग अभिमानवश मुझ सर्वात्मिका मायाको भूल गये। तुम्हारी बुद्धि अहंकारसे आवृत हो गयी थी। अतः तुमपर अनुग्रह करनेके लिये ही मेरा ही अनुत्तम तेज यक्षरूपमें प्रकट हुआ था। वस्तुतः वह मेरा ही रूप था। तुमलोग अभिमान त्याग करके मुझ सच्चिदानन्दस्वरूपिणी देवीके शरणागत हो जाओ।' इस प्रकार इन्द्रको शिक्षा देकर तथा देवताओंके द्वारा सुपूजित होकर मूल प्रकृति भगवती आदिशक्ति वहीं अन्तर्धान हो गयीं।

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