उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: धीरज यादव
बलिया:-संत शिरोमणि रविदास निर्गुण भक्ति धारा के सबसे प्रसिद्ध एवं प्रमुख संतों में से एक थे। इनकी गणना भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के महान संतों में की जाती है। संत रविदास समाज में बड़े-छोटे के भेद-भाव के खिलाफ थे। उन्होंने हमेशा जाति, धर्म एवं वर्ण के मध्य दूरियों को मिटाने एवं उन्हें कम करने का प्रयास किया। वे बचपन से ही समाज में पनपी बुराइयों को दूर करने के प्रति अग्रसर रहे। इनको ईश्वर का अनुयायी माना जाता है। माघी पूर्णिमा के दिन इनकी जयंती धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ प्रत्येक वर्ष मनाई जाती है।
हिंदी पंचांग के अनुसार रविदास का जन्म वाराणसी के पास एक गांव गोवर्धनपुर में 1388 में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। हालांकि इनके जन्म के संबंध में विद्वानों का कई मत है। रविवार के दिन जन्म होने के कारण इनका नाम रविदास रखा गया। इनके पिता का नाम संतोष दास तथा माता का नाम कलसा देवी था। निम्न जाति में जन्म लेने के कारण इनकी प्रारंभिक शिक्षा में कुछ अड़चनें आई परंतु इनकी प्रतिभा को देखकर इन्हें पंडित शारदानंद पाठशाला में नामांकन मिला। रविदास का विवाह लोना नामक कन्या से हुआ था। जूता सिलाई व चर्म का कार्य इनका पैतृक व्यवसाय था। बचपन से ही इनका झुकाव भक्ति की ओर रहा। वे हमेशा राम-जानकी व गंगा पूजा एवं सत्संगो में लीन रहा करते थे। इनके गुरु रामानंद जी तथा शिष्या मीराबाई थी। वे आपसी प्रेम,भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। साधु संतों की सेवा व सहायता करने में उन्हें विशेष आनंद मिलता था।
एक बार किसी अवसर पर रविदास के मित्रों ने इन्हें गंगा स्नान करने के लिए चलने को कहा, लेकिन उसी दिन उन्हें एक व्यक्ति को जूता सिलकर देने का वादा किया था। कर्मयोगी रविदास ने अपने कार्य को प्राथमिकता दी एवं मित्रों से कहा- "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। रविदास की रचनाओं में उनके पद हमें गुरुग्रंथ साहब में देखने को मिलते हैं। रविदास की भाषा तत्कालीन उत्तर भारत की जनता के प्रति राष्ट्रीयता, एक सूत्रता की भाषा बन गई। इन्होंने अवधी, फारसी व ब्रजभाषा अधिक प्रयोग किया था। 1540 ईस्वी में उन्होंने वाराणसी में अपना देह त्याग दिया था। उस समय उनकी आयु लगभग 120 वर्ष की थी।
संत रविदास ने समाज के लोगों को संदेश दिया था कि- "व्यक्ति कोई बड़ा-छोटा या महान अपने जन्म से नहीं अपितु अपने कर्म से होते हैं।" संत रविदास अपने कर्मों के कारण आज भी दलितों के बीच ईश्वर के रूप में पूजे जाते हैं। संत रविदास का जीवन और उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी विचारधारा पूरी मानवता का कल्याण करती रहेगी, उनका जीवन सबके लिए अनुकरणीय है।

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