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    एक युवा पत्रकार का जीवन और उसके पीछे उसकी दुनिया का दर्द, जिसे कम ही लोग समझ सकते है......

     

    उत्तर प्रदेश अयोध्या 
    इनपुट: संतोष मिश्रा 


    अयोध्या:----यकीन नहीं होता है कि अचानक 2 घंटे में मनोज तिवारी दुनिया से चले गए.... हंसता हुआ चेहरा, मस्त मौला युवा, हल्की हल्की मुस्कुराहट लिए मिलते तो कहते भैया हमार समाचार देखे रह्या ...
    (इसी तरह अभी कुछ दिन पूर्व मेरे भाई आज तक के बलबीर सिंह भी इसी तरह चले गए थे....…..)
    आज मनोज तिवारी.....
    क्या मिला इस दुनिया, समाज से 45 साल की उम्र में पत्नी को बैद्यवत्व का जीवन जीने, माता पिता को एक हुक देकर अपने 3 बच्चों से अचानक चले जाना, यही जीवन का यथार्थ सत्य है। किसी को भी अपनी मौत का पता नहीं होता है....बड़े से बड़े ज्ञान देने वाले वैरागी, संत महंत और ज्योतिष को भी यह मालूम नहीं होता है। की उसकी मौत कब होगी ?
    मनोज तिवारी जैसे कई युवा जिले से अचानक चले गए, आखिर कारण क्या है, क्यों युवाओं की मौत अचानक हो रही है, क्या जीवन जीने में लोगों को कही कुछ गलत हो रहा है, पहले ऐसा कम होता था....
    जो लोग जीवन भर अपने लिए दूसरे का गला काटते हुए अपने सभी रिश्ते नातों को रौंदते हुए आगे बढ़ रहे है क्या उन्हें काल के क्रूरता का पता नहीं है, क्या वह यह भूल गए है कि वह भी कभी अचानक दुनिया से प्रस्थान हो जाएंगे और केवल उनके अच्छे व बुरे कार्य ही रह जाएगा, परिवार, नातेदार और मित्र भी 13 दिन बाद जल्दी भूल जाएंगे...
    जिस अखबार, चैनल, पोर्टल, सोशल मीडिया में आप होगे कोने एक दो लाइन में आपका शोक व्यक्त होकर पन्ना बंद हो जाएगा, आप कैसे थे क्यों थे, किसके लिए थे आदि पर चर्चाओं का विराम लग जाता है। आपको अपने ही भुला देंगे, परिवार जैसे तैसे आगे बढ़ जाएगा, बेटे बेटी भी पल जाएंगे...
    ....केवल पत्नी और माता पिता अगर है तो वह पूरे जीवन घुट घुट कर मरते रहेंगे...एक युवा बेवा की गति और जीवन भगवान भरोसे ही होता है परिवार और बेटा लायक है तो कुछ हद तक पत्नी का घाव भर जाता है लेकिन दिल के किसी कोने में अपने लाडले पति की कुक बनी रहती है जिसे वह किसी को न बता सकती है न ही दिखा सकती है, माता पिता भी अपने युवा पुत्र के जाने के बाद जल्दी ही टूट कर मौत की कामना करने लगते है, और धीरे धीरे वह भी चले जाएगी तो बेचारी अकेली नीरस जीवन और सादे कपड़े में लिपटी एक दुबली काया  में अपनी भी मौत का इंतजार करती है।
    बेटे बेटी भी अपने अपने काम धंधे में लग जाते है उनकी शादियां भी होती है उनका परिवार और जीवन भी आगे बढ़ता है लेकिन एक बेवा की हालत क्या होती होगी इसका किसी को कल्पना नहीं होती है।
    कल भी सूरज निकलेगा...कल भी लोग होंगे लेकिन
    अपनो से बिछड़ कर दूसरी दुनिया में जाने वाले नहीं होंगे...

    अखबार का जीवन हो या पोर्टल या अन्य चैनल का जीवन, युवाओं में चैनल और पोर्टल सहित सोशल मीडिया की तरफ तेजी से हो रहा है शुरुआत में तो बहुत अच्छा लगता है, जब तक जिम्मेदारियों का बोझ नहीं होता है तो लोग अपने को इसी में ढाल देते है लेकिन हासिल क्या होता है, चंद खनकते सिक्के और कुछ वाह वाही लेकिन अगर इसकी कमाई से परिवार, समाज और घर चलना हो तो 2 से 5 प्रतिशत लोग ही यह कार्य कर सकते है। शेष लोग धीरे धीरे इस लाइन में आकर अवशेष होने के लिए जीवन को तबाही की तरफ हालत के अनुसार छोड़ देते गए। बड़े बैनर से जुड़े हो या छोटे 90 फीसदी लोगों के किसी के जीवन में संपूर्णता नहीं आ सकती है। 
    आज मनोज तिवारी जैसे तमाम युवा असमय काल के गाल में समा जा रहे है अपने पीछे एक कहानी और सोच को छोड़ जाते है...
    प्रिय अनुज मनोज तिवारी को मन की गहराइयों से नमन 
    के के मिश्रा पत्रकार अयोध्या संतोष मिश्रा पत्रकार अयोध्या

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