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    Gyan:नवरात्र पर्व एक खोज है (भाग 10)दुर्गा सप्तशती:"मंत्र-तंत्र-यंत्र" और "बलिप्रथा"डॉ जयप्रकाश तिवारी



    बलिया/लखनऊ, उत्तर प्रदेश
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
    बलिया/लखनऊ, उत्तर प्रदेश :---"नवरात्र" देवी आराधना में साधना की प्रायः तीन प्रमुख पद्धतियां दिखाई पड़ती हैं और ये हैं मंत्र, तंत्र और यन्त्र। इनके साथ ही एक प्रथा जुड़ी हुई है "पशुबलि" की प्रथा। पशुबलि की प्रथा के औचित्य पर प्रश्न प्राचीन काल से उठते रहे हैं। यद्यपि इस प्रथा में कमी आई है तथापि नवरात्रि पर ऐसी घटनाएं दिखती रहीं है और कहीं कहीं आज भी जीवित हैं। आज इन्हीं बिंदुओं पर विचार करेंगे किंतु विचार से पूर्व आवश्यक है कि दर्शक के इन चारों अवयवों को पहले समझ लिया जाय।

    मंत्र क्या है?:
    मंत्र दो शब्दों से मिलकर बना है, मन + त्र (त्राण अशांति से) = अर्थात् मन की शांति या मन की शुद्धि। कैसे? और किससे? ध्वनि तरंगों से, ऐसी ध्वनि तरंगें जो अपनी लयात्मक कम्पन द्वारा मन की अनावश्यक भाग दौड़ को रोके, साधे और शांत करे। हम जानते हैं कि प्रत्येक ध्वनि की अपनी अलग अलग आवृत्ति होती है और प्रत्येक आवृत्ति अपनी एक विशिष्ट भूमिका निभाती है। मंत्र भी एकाक्षर ॐ से लेकर पंचाक्षरी, ग्यारह अक्षरी और इससे भी बड़े होते हैं। मंत्र में ही स्तवन, प्रार्थना, स्तुति को भी सम्मिलित किया जा सकता है। मंत्र प्रायः गुप्त होते है किंतु स्तुति और स्तवन सस्वर लयबद्ध गेय छंद होते हैं। मंत्र गेय नहीं, गुप्त होते हैं, मंत्रों का मानसिक जप अपना प्रभाव देता है। मंत्र का मुख्य कार्य मन को नियंत्रित करना है।

    तंत्र क्या है?
    "तनोति त्रायति तंत्र:", अर्थात तनना, विस्तार, फैलाव, प्रसारण और संकुचन भी। केंद्रीभूत होना भी तंत्र ही है। यदि शब्द विन्यास दृष्टि से देखे तो तंत्र भी दो शब्दों से मिलकर बना है, तन् + त्र = शारीरिक शांति, तन पर नियंत्रण। यह तन "स्व का", "पर का" या मृत (शव) भी हो सकता है। कहा जाता है कि तंत्र एक प्रक्रिया है, शरीर और मन के एकाकार की, शुद्धि की। यह भौतिक और आध्यात्मिक साधनाओं का उचित समन्वय भी बताया जाता है। तंत्रों की कुल संख्या 64 बताई जाती है।

    यंत्र क्या है?
    तंतुओं के ताना बाना की बुनाई को यंत्र कहते हैं। यह तंतुओं की तनाव पर आधारित आकृति विशेष होती है। इस साधना में कर्म रूपी चादर पर प्रारब्ध रूपी आकृति की बुनाई होती है, जिसे यंत्र कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह सुरक्षा, ध्यान केंद्रीकरण, वशीकरण, मारण के उपयोग में लगाए जानेवाला एक उपकरण है। यह धातुपत्र, चित्र, आकृति, मंत्र पोषित या रैखिक चित्रकारी के रूप में हो सकता है। यह सुरक्षा कवच और सिद्धिदाई रूप में भी हो सकता है। कभी कभी विशिष्ट प्रकार की मूर्तियां प्रतीक चिह्न आदि की उपासना भी यंत्र उपासना में ही आता है।

    "दुर्गासप्तशती" में साधना का स्वरूप:
    दुर्गासप्तशती में मंत्र , स्तुति, स्तन, प्रार्थना ही सर्वत्र व्याप्त है। इसमें तंत्र और यन्त्र का प्रयोग कहीं नहीं दिखता। प्रथम अध्याय में ब्रह्मा जी ने मधु कैटभ के भय से अपनी रक्षा हेतु देवी स्तवन/ स्तुति किया। द्वितीय अध्याय में देवताओं और ऋषियों ने देवी स्तवन किया। तृतीय अध्याय में अंत में स्तुति किया गया है। चतुर्थ अध्याय में इन्द्र आदि ने स्तवन किया है तथा पुष्प, दीप, सुगंध, चंदन आदि समर्पित कर पूजन कार्य किया है। पंचम अध्याय में स्तवन, स्तुति है। एकादश अध्याय में भी स्तवन और स्तुति है। हां, द्वादश अध्याय के मंत्र संख्या में देवी ने कहा है कि जिस मंदिर में प्रतिदिन विधि पूर्वक मेरे महात्म्य का पाठ (अर्थात स्तुति, स्तवन, महिमा गायन) होता है उस स्थान को मैं कभी नहीं छोड़ती (12/9)। इसी अध्याय के मंत्र सांख्य 10 और 11 में पहली बार बलि शब्द का प्रयोग हुआ है। आइए इसे देखें - "*बलिप्रदाने पूजयामग्निकार्ये महोत्सवे.."*। तथा "*जानताsजानता वापि बलि पूजां तथा कृताम्"*। यहां इस इस ग्रंथ के अनुवादकों, विवेचकों, व्याख्याकारों ने "बलि" शब्द की व्याख्या नहीं की, सीधे सीधे "बलि" लिखकर आगे बढ़ गए। "बलि" शब्द का निहितार्थ हमे अंतिम त्रयोदश अध्याय में स्पष्ट रूप से होता है जहां राजा सुरथ और वैश्य समाधि द्वारा देवी की पूजा की जाती है। वहां वर्णन है कि उन दोनों ने उत्तम देवी सूक्त का मंत्र जप करते हुए अपनी तपस्या पूर्ण की। कैसे की? इसका उल्लेख ग्रंथ करता है, नदी के तटपर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पुष्प, धूप, दीप, सुगन्ध और हवन आदि के द्वारा संपन्न की। पहले तो आहार को धीरे धीरे कम किया, फिर बिल्कुल निराहार रहकर देवी में मन लगाकर, एकाग्रता पूर्वक चिंतन किया। वे दोनों अपने शरीर के रक्त से "प्रोक्षित बलि" देते हुए लगातार तीन वर्ष तक संयम पूर्वक आराधना करते रहे। साधना पूर्ण होने पर देवी ने दर्शन दिया, उनको अभीष्ट फल प्राप्ति हेतु मनोवांछित वरदान दिया। यहां हिंदी मत "प्रोक्षित बलि" और संस्कृत श्लोक में, मंत्र टी *निजगात्रासृगुक्षितम्* शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका निहितार्थ है "अपनी पशुता की बलि", अपनी विकृतियों की बलि"। इसमें कहीं भी दूर दूर तक *पशु बलि* की कल्पना तक नहीं है, इसका व्यावहारिक प्रयोग तो बहुत दूर की बात है।
             File Photo of डॉ जयप्रकाश तिवारी

    अब प्रश्न है कि पूजन प्रक्रिया, उपासना विधान में यह हिंसक पशुबलि प्रथा आया कैसे? कब आया? किन परिस्थितियों में आया? यह एक अलग शोध का विषय है। इसे फिर कभी चिंतन का स्वतंत्र विषय वस्तु बनाऊंगा।

    निष्कर्ष :

    दुर्गासप्तशती में केवल मंत्र जाप, स्तवन, स्तुति, प्रार्थना और प्राकृतिक पुष्प, फल, दीप, सुगन्ध, धूप एवं औषधीय समिधा से हवन, मंत्रोच्चा सहित आहुति का ही विशुद्ध अहिंसक विधान है।

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