उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश:--गुजरात के पावन गिरनार पर्वत पर विराजमान खप्परवाली महाकाली माँ आदिशक्ति का उग्र, तेजस्वी और रक्षक स्वरूप मानी जाती हैं। उनके हाथ में धारण किया गया खप्पर (कपाल-पात्र) अहंकार, अज्ञान, भय और नकारात्मक प्रवृत्तियों के अंत का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय श्रद्धा के अनुसार माँ अपने भक्तों की रक्षा करती हैं तथा धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वालों को साहस एवं आत्मबल प्रदान करती हैं।
माँ की उपासना दो परंपराओं में वर्णित है। सामान्य श्रद्धालुओं के लिए सात्त्विक पूजा सर्वोत्तम मानी जाती है, जबकि तांत्रिक साधना केवल योग्य एवं सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन में ही की जानी चाहिए। बिना गुरु के तांत्रिक साधना का प्रयास नहीं करना चाहिए।
सात्त्विक साधना की सरल विधि
प्रातः स्नान करके स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। माँ के चित्र या विग्रह के सामने घी का दीपक और धूप जलाएँ। लाल पुष्प, सिंदूर, अक्षत, नारियल तथा फल अर्पित करें। इसके बाद श्रद्धापूर्वक कम से कम 108 बार इस मंत्र का जप करें—
॥ ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥
जप के बाद महाकाली अष्टक, काली चालीसा या दुर्गा सप्तशती के किसी अध्याय का पाठ करें तथा अंत में माँ से समस्त प्राणियों के कल्याण और अपने जीवन में सद्बुद्धि, निर्भयता एवं धर्मपालन की प्रार्थना करें।
महाकाली अष्टकम्
नमस्ते कालिके देवि नमस्ते भक्तवत्सले।
नमस्ते जगतां मातः नमस्ते दुःखनाशिनि॥
नमस्ते घोररूपायै नमस्ते मुण्डमालिनि।
नमस्ते शूलहस्तायै नमस्ते खड्गधारिणि॥
नमस्ते रक्तवर्णायै नमस्ते सिंहवाहिनि।
नमस्ते महादेवि नमस्ते करुणामयि॥
नमस्ते विश्वरूपायै नमस्ते विश्वपालिनि।
नमस्ते सर्वसिद्ध्यै च नमस्ते मोक्षदायिनि॥
महत्वपूर्ण सूचना: यह सात्त्विक उपासना का सामान्य मार्गदर्शन है। महाकाली की तांत्रिक साधना, बीजमंत्रों के विशेष अनुष्ठान एवं गूढ़ प्रयोग केवल योग्य गुरु की दीक्षा और मार्गदर्शन में ही करने चाहिए।
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