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    माघी संकष्ट (संकष्ट तिल चतुर्थी) विशेष.‼️संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रोदय का समय‼️

     
    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 

    बलिया उत्तरप्रदेश :---संकष्ट तिल चतुर्थी या सकट चौथ माघ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को कहा जाता है।
    संतानों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत माघ कृष्णपक्ष चतुर्थी 17 जनवरी, शुक्रवार को मनाया जाएगा।

     संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रोदय का समय‼️

    संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा की पूजा करने के बाद ही यह व्रत पूरा माना जाता है। इस दिन चंद्रोदय का समय रात 8:49 बजे है।
    हालांकि, अलग-अलग जगहों पर चांद निकलने के समय में थोड़ा बदलाव हो सकता है।
     
    🚩 पूजा विधि‼️

      संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद संकष्टी चतुर्थी व्रत का संकल्प करना चाहिए। फिर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणपति की मूर्ति स्थापित करें। इसके बाद उस पर कुमकुम लगाएं और घी का दीपक जलाएं।
     फिर भगवान गणेश की मूर्ति पर फूल, फल और मिठाइयां चढ़ाएं। इस पूजा में तिलकुट का प्रसाद अवश्य शामिल करना चाहिए। इस दिन नियमित रूप से गणेश चालीसा का पाठ करें। पूजा के अंत में गणेश जी की आरती करें, चौथ माता की कथा सुने। प्रार्थना करके प्रसाद खाकर व्रत का पारण करें।

    प्रार्थना‼️

    रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य रक्षक:
    भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात ||

    अनया पूजया गणपति: प्रीयतां न मम कहकर प्रणाम कर आरती के लिए खड़े हो जाये।
     
    श्री गणेश जी की आरती‼️

    जय गणेश,जय गणेश,जय गणेश देवा |
    माता जाकी पारवती,पिता महादेवा ||
    एक दन्त दयावंत,चार भुजा धारी |
    मस्तक पर सिन्दूर सोहे,मूसे की सवारी || जय ...

    अंधन को आँख देत,कोढ़िन को काया |
    बांझन को पुत्र देत,निर्धन को माया || जय ...

    हार चढ़े,फूल चढ़े और चढ़े मेवा |
    लड्डुअन का भोग लगे,संत करें सेवा || जय ...

    दीनन की लाज राखो,शम्भु सुतवारी |
    कामना को पूरा करो जग बलिहारी || जय ...

    संकष्ट चतुर्थी की कथा ‼️पौराणिक कथा 1.‼️

    चतुर्थी व्रत से सबंधित कथा भगवान श्री गणेश जी के जन्म से संबंधित है तो कुछ कथाएं भगगवान के भक्त पर की जाने वाली असीम कृपा को दर्शाती है. इसी में एक कथा इस प्रकार है. शिवपुराण में बताया गया है कि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर गणेशजी का जन्म हुआ था. इस कारण चतुर्थी तिथि को जन्म तिथि के रुप में मनाया जाता है. इस दिन गणेशजी के लिए विशेष पूजा-पाठ का आयोजन होता है. मान्यता के अनुसार एक बार माता पार्वती स्नान के लिए जब जाने वाली होती हैं तो वह अपनी मैल से एक बच्चे का निर्माण करती हैं और उस बालक को द्वारा पर पहरा देने को कहती हैं.
    उस समय भगवान शिव जब अंदर जाने लगते हैं तो द्वार पर खड़े बालक, शिवजी को पार्वती से मिलने से रोक देते है. बालक माता पार्वती की आज्ञा का पालन कर रहे होते हैं. जब शिवजी को बालक ने रोका तो शिवजी क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर धड़ से अलग कर देते हैं. जब पार्वती को ये बात मालूम हुई तो वह बहुत क्रोधित होती हैं. वह शिवजी से बालक को पुन: जीवित करने के लिए कहती हैं. तब भगवान शिव ने उस बालक के धड़ पर हाथी का सिर लगा कर उसे जीवित कर देते हैं. उस समय बालक को गणेश नाम प्राप्त होता है. वह बालक माता पार्वती और भगवन शिव का पुत्र कहलाते हैं।

    कथा 2.‼️

    एक अन्य कथा के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती एक बार नदी किनारे बैठे हुए थे। उसी दौरान माता पार्वती को चौपड़ खेलने का मन हुआ। लेकिन उस समय वहां माता और भगवान शिव के अलावा कोई और मौजूद नहीं था, लेकिन खेल में हार-जीत का फैसला करने के लिए एक व्यक्ति की जरुरत थी। इस विचार के बाद दोनों ने एक मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसमें जान डाल दी और उससे कहा कि खेल में कौन जीता इसका फैसला तुम करना। खेल के शुरु होते ही माता पार्वती विजय हुई और इस प्रकार तीन से चार बार उन्हीं की जीत हुई। लेकिन एक बार गलती से बालक ने भगवान शिव का विजयी के रुप में नाम ले लिया। जिसके कारण माता पार्वती क्रोधित हो गई और उस बालक को लंगड़ा बना दिया। बालक उनसे क्षमा मांगता है और कहता है कि उससे भूल हो गई उसे माफ कर दें। माता कहती हैं कि श्राप वापस नहीं हो सकता लेकिन एक उपाय करके इससे मुक्ति पा सकते हो। माता पार्वती कहती हैं कि इस स्थान पर चतुर्थी के दिन कुछ कन्याएं पूजा करने आती हैं, तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को श्रद्धापूर्वक करना।

    चतुर्थी के दिन कन्याएं वहां आती हैं और बालक उनसे व्रत की विधि पूछता और उसके बाद विधिवत व्रत करने से वो भगवान गणेश को प्रसन्न कर लेता है। भगवान गणेश उसे दर्शन देकर उससे इच्छा पूछते हैं तो वो कहता है कि वो भगवान शिव और माता पार्वती के पास जाना चाहता है। भगवान गणेश उसकी इच्छा पूरी करते हैं और वो बालक भगवान शिव के पास पहुंच जाता है। लेकिन वहां सिर्फ भगवान शिव होते हैं क्योंकि माता पार्वती भगवान शिव से रुठ कर कैलाश छोड़कर चली जाती हैं। भगवान शिव उससे पूछते हैं कि वो यहां कैसे आया तो बालक बताता है कि भगवान गणेश के पूजन से उसे ये वरदान प्राप्त हुआ है। इसके बाद भगवान शिव भी माता पार्वती को मनाने के लिए ये व्रत रखते हैं। इसके बाद माता पार्वती का मन अचानक बदल जाता है और वो वापस कैलाश लौट आती हैं। इस कथा के अनुसार भगवान गणेश का संकष्टी के दिन व्रत करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है और संकट दूर होते हैं।

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