बलिया उत्तरप्रदेश
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश:--दाल है बनाकर खाई जाएगी तो फिर पॉलिश करके सुंदर बनाने की क्या आवश्यकता है?
उसे खाना है शोरूम में सजाना थोड़ी न है कि उसे सुंदर होना जरूरी ही है।
ये दाल देखिए जरा!
थोड़ी बदरंग है, कुछेक में छिलके भी नहीं छूटे हैं लेकिन हां जब ये रसोई में पकेगी तो इसके सुगंध से आपकी रसोई भर जाएगी। सुगंध से भूख जागृत हो जाएगी मन जल्दी से भोजन करने के लिए मचल उठेगा।
ये घर की अरहर दाल है।
जब खेतों में अरहर की फलियां पक जाती है तब हिलने पर खनकती हैं मानों उनमें दाने नहीं मोती भरे हुए हैं।
इसका पौधा इतना मजबूत होता है कि गंडासा से अरहर काटी जाती है।
काट कर खेतों से बोझ बनाकर खलिहान में ढोकर लाई जाती है। अरहर के बोझ को हमारी तरफ भीरी कहते हैं।
फसल काटने को जब तैयार हो जाती है तो सबसे पहले खलिहान की घास छिल कर, गड्ढे इत्यादि पाट कर चिकना करके गोबर चिकनी मिट्टी से लीप कर साफ सुथरा किया जाता है और फिर फसल काट काट कर खलिहान में रखा जाता है।
अरहर की भीरियों को एक दूसरे से टीका कर खड़ा कर दिया जाता है ताकि कम स्थान घेरे।
इन भीरियों के अंदर बैठने लायक जगह बन जाती है जिसके अंदर बैठकर हम बच्चे आम के टिकोरे चुपके चुपके खाते थे ताकि कोई देख न सके नहीं तो हिस्सा देना पड़ जाएगा।
अरहर की भीरी खड़ी कर दी जाती थी और फिर मटर, अलसी, चना, सरसों, मसूर काट काट कर लाकर खलिहान में रखते जाते थे।
खलिहान गांव के बाहर सबका सामूहिक होता था इसलिए सभी गांव वाले इस खलिहान में अपनी अपनी फसल रखते थे। खलिहान में बड़े बड़े आम के पेड़ थे जिससे छाया भी रहती थी।
सभी लोग एक एक करके अपनी फसल को छकनी से या मुंगरी से पीट कर या फिर बैलों से दांवरी चला कर मड़ाई करते, ओसा कर साफ करते थे।
काम करते करते थक जाते थे तब थोड़ी देर पेड़ के नीचे बैठकर आराम करते, घर गुड़ और पानी मंगाते, पीते सुस्ताते, एकाध बीरा खैनी बनाते खाते और फिर काम करने में डट जाते। सारा अन्न जब साफ हो जाता फिर घर ले जाते।
अरहर की भीरियों की बारी सबसे बाद में आती थी क्योंकि ज्यादा जगह लेती थीं।
सबसे पहले डंडा या छकनी से इन्हें पीटा जाता अधिकतर दाने निकल जाते थे जो दाने के बजाय फलियां टूटती थीं उन्हें मुंगरी से कूटकर निकलते थे।
जब खलिहान से अरहर घर आ जाती थी तब अरहर से दाल बनाने का उपक्रम शुरू होता था।
चकिया के दोनों पाट धोकर सूखने के लिए खड़े कर दिए जाते थे। लकड़ी की बनी गुल्ली जैसे हत्थे पर सूती कपड़ा भिगोकर फिर चकिया में ठोंककर बैठाया जाता था ताकि चकिया चलाते समय हत्था न उखड़े।
दुआर पर बड़के चूल्हे पर फुलेसरा काकी माटी की बनी कड़ाही चढ़ा देती थी और अरहर ततै कर (सेंक कर) रखती थीं।
तनिक सम्था जाने पर फिर चकिया चलाकर दाल दली जाती थी।
एक महिला चकिया चलाती, दूसरी सूप से पछोर कर भूसी अलग करती, तीसरी झन्ना लेकर जो अरहर बिन दले साबुत गिर जाती थी उसे निकाल कर अलग करती।
जब दाल दल ली जाती थी तब पाहरूवा से कूट कर छांटी जाती थी। छांटने से रही सही भूसी यानी छिलका निकल जाता था और तब जाकर दाल बनाने लायक होती थी।
झन्ना से झाड़ने पर जो अरहर निकलती थी या छांटने के बाद भी जिनकी भूसी नहीं उतरती थी उनमें थोड़ा पानी डाल कर करमोया (हल्का भिगोया) जाता था और फिर सन के बोरे से ढंक देते थे इससे छिलका फूल जाता था और फिर आसानी से उतर जाता था।
दलने, कूटने, छांटने के उपक्रम में जो दालें टूट जाती थीं उन्हें साफ करके अलग रख लिया जाता था। इन बारीक टुकड़ों को चूनी कहते हैं।
इन्हें भिगो कर इनमें थोड़ा गेहूं का आटा मिलाकर, बारीक प्याज, हरी मिर्च, लहसुन काटकर डालते नमक मिलाते फिर बढ़िया मोटी सी चूनी की रोटी बनाकर सिरके संग खाकर आनंद लेते थे।
पोस्ट अच्छी लगे तो लाइक और शेयर करें
कॉमेंट में अपने विचार अवश्य व्यक्त करें

TREND