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    बिहार में बेवजह बने पुल, इन विभागों में भी भारी गड़बड़ी, CAG रिपोर्ट में नीतीश सरकार पर गंभीर सवाल



    बिहार पटना 
    इनपुट: समाचार डेस्क 



    पटना:---उपमुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री सम्राट चौधरी ने बिहार विधानसभा में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का 31 मार्च 2022 को समाप्त हुए वर्ष के लिए प्रतिवेदन पेश किया. इस कैग रिपोर्ट में भवन निर्माण, बिहार राज्य फसल सहायता योजना, बिहार के विश्वविद्यालय में वित्तीय अनियमित और विकास योजना से संबंधित कई टिप्पणियां की गई है. बाढ़ नियंत्रण कार्य में भी सरकार के फैसले से करोड़ रुपये की नुकसान होने की बात कही गई है.
    बिना सत्यापन के 48.5 करोड़ का भुगतान: कैग रिपोर्ट में वित्तीय वर्ष 2017 से 22 के दौरान बिहार के विश्वविद्यालय में 22576.33 करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया था. जिसमें से 4134.21 करोड़ जो बजट प्रावधान का 18% है, इस्तेमाल ही नहीं हो पाया. कैग ने यह भी कहा है कि उचित सत्यापन के बिना ही शिक्षक और गैर शिक्षक कर्मियों के वेतन बकाया की 48.5 करोड़ की राशि भुगतान कर दी गई.
    विश्वविद्यालय को लेकर भी अनियमितता आई सामने: कामेश्वर सिंह दरभंगा विश्वविद्यालय में सातवें केंद्रीय वेतनमान के लिए 201 शिक्षकों को 14.41 करोड़ का भुगतान किया गया है. आयकर अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन कर 4.32 करोड़ की कटौती भी नहीं की गई. 22 शिक्षकों को साथ में सीपीसी के बकाए के संबंध में 0.59 करोड़ का अधिक भुगतान किया गया. कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि विश्वविद्यालय में 1795 पात्र कर्मचारियों में से 1453 कर्मचारी जो कुल कर्मचारी का 81% होता है, अस्थाई सेवानिवृत्ति खाता संख्या नहीं बनाया गया था.
    रिक्त पदों को लेकर रिपोर्ट में कई खुलासे: कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 11 नमूना जांच में विश्वविद्यालय में शिक्षक कर्मचारियों के 57% पद रिक्त पड़े थे. शिक्षक के साथ गैर शिक्षक कर्मचारी दोनों की काफी कमी मिली. 11 चयनित विश्वविद्यालय के नमूने जांच में शिक्षक कर्मचारी के 9240 पद स्वीकृत किए गए थे. इनमें से केवल 3998 शिक्षक ही मौजूद थे, जो 43% के करीब होता है और 5242 यानी 57% पद रिक्त पड़े थे. शिक्षण स्टाफ की कमी बीएनएमयू में 49% से एमएमएचएपीयू में 86% तक थी. इसी तरह गैर शिक्षक कर्मचारी के लिए 9970 पद स्वीकृत थे, जिसके विरुद्ध केवल 4358 यानी 44% कर्मचारियों की ही नियुक्ति की गई थी. 5612 पद यानी 56% रिक्त पड़े थे.
    उपयोगिता प्रमाण पत्र भी नहीं जमा हुआ: कैग ने 2009-10 से 2020-21 की अधिक दौरान 9 नमूना जांच में विश्वविद्यालयों ने पुस्तकालय, प्रयोगशाला, अनुशिक्षण इत्यादि के लिए 252.74 करोड़ की राशि का अनुदान प्राप्त किया था, जिसके विरुद्ध 101.53 करोड़ का उपयोगिता प्रमाण पत्र अभी भी प्रस्तुत किया जाना बाकी था. विश्वविद्यालय में 2017-18 से 2021-22 के दौरान स्नातक और स्नातकोत्तर परीक्षा के परिणाम 60 दिनों की निर्धारित अवधि की तुलना में 946 दिनों तक के विलंब से प्रकाशित किए गए.
    लेनदेन में देरी से भी नुकसान: कैग ने बिहार राज्य फसल सहायता योजना को लेकर भी अनियमिता की ओर रिपोर्ट में खुलासा किया है. कैग ने रिपोर्ट में कहा है कि 5091243 सत्यापित आवेदनों में से 2630 462 आवेदनों को भूमि स्वामित्व दस्तावेज हो या स्व घोषणाओं सत्यापन के दौरान अनुपस्थित आदि से संबंधित मुद्दों के कारण निरस्त कर दिया गया. 24 लाख 8275 लेनदेन से संबंधित 1424.59 करोड़ की वित्तीय सहायता के मुकाबले 15 लाख 27419 लेनदेन से संबंधित 867.36 करोड़ के लाभुकों का भुगतान 21 महीने तक विलंब से किया गया.
    भारी अनियमितताओं की तरफ इशारा: सहकारिता विभाग ने रवि 2019-20 एवं खरीफ 2021 के मौसम के दौरान 13 ग्राम पंचायत के 12398 लाभार्थियों से संबंधित 15.60 करोड़ की भुगतान की राशि सत्यापन और सूचना के अभाव में रोक दिया और अभी तक इसका सत्यापन नहीं किया गया है. भवन एवं अन्य निर्माण कामगारों के कल्याण को लेकर भी कैग में अनियमितताओं की तरफ इशारा किया गया है.
    देरी के कारण हुआ नुकसान: कैग ने रिपोर्ट में कहा है कि बिहार सरकार ने 9 वर्षों की देरी से सितंबर 2005 में बीबीओसीडब्ल्यू नियमावली बनाई, जिसके चलते संबंधित कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में विलंब हुआ. नियमावली बनाने के बाद बीबीओसीडब्ल्यू बोर्ड का गठन 18 महीने देरी से फरवरी 2008 में किया गया. उसके अलावे बोर्ड एवं राज्य सरकार समिति को फरवरी 2015 के बाद पुनर्गठित नहीं किया गया था. 1875 इकाइयों में से केवल पांच इकाइयों को श्रम संसाधन विभाग से पंजीकृत कराया गया. कैग ने यह भी कहा कि वित्तीय वर्ष 2017 से 22 के दौरान बोर्ड ने अपना बजट तक तैयार नहीं किया और इसके कारण 1650.06 करोड़ की एक बड़ी निधि संचय हो गया.
    476.90 करोड़ विश्व बैंक की सहायता से वंचित रहा बिहार: नीर निर्मल परियोजना को लेकर भी कैग रिपोर्ट में लेट लतीफी को लेकर कहा है कि फरवरी 2014, फरवरी 2016 और फरवरी 2017 से परियोजना शुरू होनी थी लेकिन और मार्च 2017 मार्च 2019 और मार्च 2020 तक पूरा किया जाना था लेकिन समय से पूरे नहीं हुए. विश्व बैंक से कुल परियोजना लागत 1606 करोड़ के मुकाबले 803 करोड़ रुपए मिलना था लेकिन देरी के कारण बिहार सरकार को विश्व बैंक से केवल 326.01 करोड़ ही प्राप्त हुए. 476.90 करोड़ रुपए की सहायता से बिहार वंचित रह गया. वहीं 4.11 करोड़ की लागत से 2423 मल्टी जेट वॉटर मीटर लगाए गए थे, जो पूरी तरह से निष्क्रिय रहे.
    बाढ़ नियंत्रण कार्य में भी गड़बड़ी: कैग ने रिपोर्ट में कहा है कि बाढ़ नियंत्रण कार्य में पुराने खाली सीमेंट बोरे के स्थान पर नए खाली सीमेंट के बोरों के इस्तेमाल करने से जल संसाधन विभाग को 21.98 करोड़ का अधिक व्यय हुआ. वर्ष 2018, 2019 और 2020 में बाढ़ नियंत्रण कार्यों के लिए 4.31 रुपए प्रति बोरा की दर से पुराने खाली सीमेंट बोरो का इस्तेमाल किया गया है लेकिन वर्ष 2021 के लिए नए खाली सीमेंट के बोरों के इस्तेमाल का निर्णय लिया गया. प्रति बोरा 9.11 रुपया की दर निर्धारित की गई, जो पुराने बोरे के मुकाबले 59% अधिक था. सरकार के फैसले से 21.98 करोड़ और भुगतान करना पड़ा.
    इन विभागों में भी अनियमितता: कैग ने स्वास्थ्य विभाग की ओर से अनुमंडलीय अस्पताल के निर्माण में भी 4.89 करोड़ के व्यय का कोई लाभ नहीं मिल पाया और निर्मित भवन को 10 सालों से बेकार छोड़ देने के कारण जर्जर हो गया. नीरा परियोजना का उचित आकलन किए बिना मशीनरी पर 11.68 करोड़ का खर्च किया गया, जो बेकार रहा है. गुड़ के उत्पादन पर 2.03 करोड़ की हानि भी हुई. वहीं, सीएजी ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के निर्देशों का उल्लंघन कर एक टोल प्लाजा के निर्माण के कारण 1.48 करोड़ का व्यर्थ व्यय की भी इशारा किया है. इसी तरह से बिहार ग्रामीण विकास एजेंसी ने उच्च ब्याज दरों पर ऋण लिया, जिसके कारण 7.08 करोड़ का अधिक भुगतान करना पड़ा।

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