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    बिहार चुनाव 2025: महागठबंधन की आंतरिक जंग और एनडीए की स्थिरता



    बिहार पटना 
    इनपुट:सोशल मीडिया 

    बिहार पटना:--बिहार की राजनीति फिर से उबाल पर है। चुनावी बिगुल बजने ही वाला है और 243 विधानसभा सीटों पर जंग की तैयारी हो रही है। सत्‍ताधारी एनडीए जहाँ नीतीश कुमार को चेहरा बनाकर स्थिरता और अनुभव का संदेश दे रहा है, वहीं विपक्षी इंडी गठबंधन (महागठबंधन) भीतर ही भीतर कलह और अविश्वास से जूझ रहा है। सवाल यही है कि क्या यह आंतरिक खींचतान विपक्ष की वापसी की राह में रोड़ा बन जाएगी?

    सत्ता बनाम विकल्प: चुनावी परिदृश्य

    एनडीए (जेडीयू-भाजपा गठबंधन) : नीतीश कुमार का चेहरा आज भी “गवर्नेंस और स्थिरता” की पहचान माना जाता है। भाजपा की संगठन क्षमता और नीतीश की क्षेत्रीय पकड़, दोनों मिलकर एनडीए को मजबूत बनाते हैं।
     महागठबंधन/इंडी गठबंधन : 2020 में 110 सीटें जीतने के बावजूद सत्ता से बाहर रहने का दर्द अब भी ताज़ा है। इस बार “वापसी” की उम्मीद है, लेकिन अंदरूनी कलह सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

    सबसे बड़ा प्रश्न: अगला सीएम कौन?

    * तेजस्वी यादव : खुद को स्वाभाविक दावेदार मानते हैं। 2020 में डिप्टी सीएम रहे और युवाओं में पकड़ है। लेकिन कांग्रेस अभी तक उनके नाम पर मुहर लगाने को तैयार नहीं।
    * कांग्रेस की दुविधा : पार्टी कहती है कि “बिना चेहरे” चुनाव जोखिम भरा है, लेकिन तेजस्वी को अकेले आगे करना भी ठीक नहीं।
    * छोटे दलों की नाराज़गी : वीआईपी, वामपंथी और अन्य सहयोगी दल चाहते हैं कि निर्णय सर्वसम्मति से हो। अगर चेहरा तय न हुआ, तो वोटर कन्फ्यूज हो सकता है।

    सीट बँटवारे का पेच

    * 2020 का फार्मूला : आरजेडी (144), कांग्रेस (70), बाकी सहयोगी।
    * कांग्रेस की माँग : इस बार 70–75 सीटें, वो भी “कुर्बानी वाली सीटें नहीं”। राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा से पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ा है।
    * वामपंथी की प्रतिक्रिया : कांग्रेस की बड़ी माँग से उनकी पुरानी सीटें खतरे में दिखती हैं। सीपीआई (एमएल) ने साफ कहा है कि कांग्रेस “यथार्थवादी” बने।

     बगावत का अंदेशा

     वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी : 60–70 सीटों और डिप्टी सीएम पद की माँग। साफ कहा—“तेजस्वी दूल्हा नंबर एक, मैं नंबर दो।”
    रणनीतिक खतरा : अगर साहनी की माँग अनसुनी हुई, तो वे एनडीए का दामन थाम सकते हैं। निषाद समुदाय का वोट बैंक विपक्ष के लिए हाथ से निकल जाएगा।
    * छोटे सहयोगी दल : सीटें कम, दावेदार ज्यादा। गठबंधन का विस्तार (5 से 9 दल) ‘समृद्धि की समस्या’ बन गया है।

    कांग्रेस की ‘बड़ी चाल’

    पटना में 24 सितंबर को कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक—1940 के बाद पहली बार—एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और तमाम नेता मौजूद रहेंगे। कांग्रेस कह रही है, “यह बिहार ही नहीं, पूरे देश की लड़ाई है।” लेकिन आलोचक इसे “सीट दबाव की रणनीति” मान रहे हैं।

    एनडीए की बढ़त कहाँ?

     गठबंधन में चेहरा तय: नीतीश कुमार।
    भाजपा की संसाधन क्षमता और बूथ प्रबंधन।
     विपक्ष की “अंदरूनी लड़ाई” को भुनाने की रणनीति।
      एनडीए मतदाताओं के सामने “स्थिरता” का नैरेटिव पेश कर रहा है, जबकि विपक्ष अभी तक “नेतृत्व” और “सीटों” पर उलझा हुआ है।

    बिहार में राजनीति का समीकरण हमेशा जातीय संतुलन, स्थानीय समीकरण और गठबंधन की मजबूती पर टिकता है। महागठबंधन के पास युवाओं को आकर्षित करने वाला चेहरा (तेजस्वी), कांग्रेस की राष्ट्रीय ताक़त और छोटे दलों के जातीय वोट बैंक का फायदा है। लेकिन यदि आंतरिक खींचतान—सीएम पद की लड़ाई, सीट बँटवारा और सहयोगियों की माँग—न सुलझी, तो यह गठबंधन “वोट बैंक की गणित” के बावजूद “सत्ता की राजनीति” में पिछड़ सकता है।

    बिहार की जनता के सामने इस बार चुनाव केवल “कौन जीतेगा” का नहीं, बल्कि “कौन स्थिरता देगा” का है। यही सवाल अगले कुछ हफ्तों में इस चुनाव का असली नैरेटिव तय करेगा।

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