उत्तर प्रदेश लखनऊ
इनपुट:सोशल मीडिया
बीमारी और भुखमरी से जूझ रहे सैनिक को सब कुछ खोने के बाद सरकार देगी पेंशन!
बत्तीस साल तक अंतिम-आदमी ने झेली चुनौतीपूर्ण स्थिति :विजय कुमार पाण्डेय
लखनऊ :--प्रयागराज जनपद के ग्राम हेतापट्टी निवासी कुमाऊँ रेजीमेंट के पूर्व नायक बलराम सिंह बहत्तर वर्ष की उम्र में सेना से निकाले जाने के बत्तीस वर्ष बाद सशत्र-बल अधिकरण लखनऊ से विकलांगता पेंशन दिए जाने का आदेश न्यायमूर्ति श्री अनिल कुमार (सदस्य न्यायिक) एवं वाइस एडमिरल श्री अतुल कुमार जैन (सदस्य प्रशासनिक) ने सुनाया l
मामला यह था कि, नायक बलराम सिंह वर्ष 1981 में टेरिटोरियल आर्मी में भर्ती हुआ लेकिन उसे वर्ष 1993 में बारह साल की सैन्य सेवा के बाद बायीं आंख में Eales’ Disease के कारण मेडिकल आधार पर बिना किसी पेंशन के सेवा मुक्त कर दिया जबकि, मेडिकल बोर्ड ने बीस प्रतिशत विकलांगता बताई और सेना सेवा से जुड़ा माना था, परंतु सन 1994 में पीसीडीए (पेंशन) प्रयागराज ने पेंशन अस्वीकार कर दी। इसके बाद 2001 में भी उनकी अर्जी खारिज कर दी गई। हार नहीं मानते हुए उन्होंने 2024 में अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय के माध्यम से न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री विजय कुमार पांडे ने दलील दी कि मेडिकल बोर्ड की राय को बिना किसी उच्चतर मेडिकल बोर्ड के, केवल लेखा विभाग ने नकार दिया-जो कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय एक्स सैपर मोहिन्दर सिंह बनाम भारत सरकार (1993) के विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि भर्ती के समय बलराम सिंह पूरी तरह स्वस्थ थे, बीमारी सेवा के दौरान हुई और इसे मेडिकल बोर्ड ने स्वीकार किया l
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के राम अवतार बनाम भारत सरकार (2014) और कमांडर राकेश पाण्डेय बनाम भारत सरकार (2019) के फैसलों का हवाला देते हुए स्थायी विकलांगता और राउंडिंग ऑफ का अधिकार बताया। केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता दिनेश कुमार पांडे ने यह तर्क दिया कि विकलांगता "ना तो सेवा से जुड़ी है, न अर्जित है और इसलिए पेंशन का हक नहीं बनता ।
खंडपीठ ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि, लेखा विभाग को मेडिकल बोर्ड की राय बदलने का अधिकार नहीं है। मेडिकल बोर्ड ने विकलांगता को स्थायी और सेवा-जनित माना, अतः यही मान्य होगा।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों ने स्पष्ट किया है कि विकलांगता पेंशन जीवन भर मिलेगी और बीस प्रतिशत को राउंड ऑफ कर पचास प्रतिशत माना जाएगा। सरकार को चार माह में भुगतान करने का आदेश दिया गया, अन्यथा आठ प्रतिशत ब्याज देना होगा।

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