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    दूसरा नवरात्री: माँ ब्रह्मचारिणी-मां ब्रह्मचारिणी की कथा



    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
    बलिया उत्तरप्रदेश:--नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है।

    ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। मां ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया। 

    नवरात्र पूजन के द्वितीय दिवस माँ ब्रह्मचारिणी के ध्यान मंत्र, स्तुति, स्तोत्र, कवच पाठ करने से मंगल ग्रह से जुड़ी समस्त पीड़ाएं दूर हो जाती है। इससे रोग दूर होते हैं और आत्मविश्वास, आत्मबल में वृद्धि होती है। और अनेक प्रकार की सांसारिक परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है।

    श्लोक

    दधानाकरपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलम्
    देवी प्रसीदतुमयिब्रह्म ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

    भगवती दुर्गा की नौ शक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। ब्रह्म का अर्थ है, तपस्या, तप का आचरण करने वाली भगवती, जिस कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया, वेदस्तत्वंतपो ब्रह्म, वेद, तत्व और ताप [ब्रह्म] अर्थ है ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है, इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बायें हाथ में कमण्डल रहता है।

    ध्यान :-

    वन्दे वांच्छितलाभायचन्द्रर्घकृतशेखराम्।

    जपमालाकमण्डलुधराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥

    गौरवर्णास्वाधिष्ठानास्थितांद्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।

    धवल परिधानांब्रह्मरूपांपुष्पालंकारभूषिताम्॥

    पद्मवंदनापल्लवाराधराकातंकपोलांपीन पयोधराम्।

    कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीनिम्न नाभि नितम्बनीम्॥

    स्तोत्र :-

    तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।

    ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

    नवचक्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।

    धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

    शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।

    शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्।

    कवच :-

    त्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।

    अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलो॥

    पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरी॥

    षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।

    अंग प्रत्यंग सतत पातुब्रह्मचारिणी॥

    स्तुति मंत्र :-

    या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

    अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

    प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह स्तुति मंत्र सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए।

    मां ब्रह्मचारिणी की कथा

    मां ब्रह्मचारिणी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारद जी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें  ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन व्रत रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शिव की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। 

    कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह आप से ही संभव थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ।
    इस तरह कठिन तप करके माँ ब्रह्मचारिणी ने शिव जी को प्राप्त किया।

    माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।

    माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है।

    ।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।।

                 

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