उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश:--भारतीय संस्कृति जितनी समृद्ध एवं प्राचीन है, उतनी शायद ही विश्व की कोई अन्य संस्कृति हो। यही कारण है कि अपने देश के रीति - रिवाज, प्रथाएं , परंपराएं, व्रत एवं त्यौहार आदि भी अति प्राचीन काल से ही अपनी पहचान बनाए हुए हैं। इन्हीं में से एक है 'शक्ति पूजा' जो अब भारतीय संस्कृति का अंग बन चुकी है।
भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजा की परम्परा अनादि काल से होती चली आ रही है, चाहे उसका स्वरूप भिन्न - भिन्न रहा हो। यदि प्रारंभिक चरणों में देखें, जब मानव आदि अवस्था में था, तब जीवन की उत्पत्ति से लेकर विकास तक का प्रत्येक चरण मातृशक्ति द्वारा रक्षित एवं पोषित था, जो आज तक भी कायम है। भारतीय दर्शन के अनुसार 'प्रकृति' को ही 'आद्या शक्ति' माना गया है। इस तरह प्रकृति ही ' शक्ति' है और ईस शक्ति को विश्व में महती स्थान प्राप्त है। इस तरह मानव द्वारा सर्व प्रथम शक्ति की पूजा 'मां' एवं ' प्रकृति' के रूप में प्रारम्भ हुई, जो कालान्तर में 'शक्ति पूजा' का आधार बना।
भारतीय संस्कृति में 'मातृशक्ति' को सर्वोच्च प्राथमिकता एवं महत्ता प्रदान की गयी है,जैसा कि स्पष्ट है -
सर्व देवमयी देवी,
सर्व देवीमयम् जगत्।
अतोअहं विश्वरूपा,
त्वां नमामि परमेश्वरीम्।।
भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है। इसकी पुष्टि हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त मृण्मय स्त्री मूर्तियों हसे हो जाती है। स्पष्ट है कि ये मूर्तियां तत्कालीन मातृदेवी की ही हैं।
वैदिक युग में देवियों की अपेक्षा देवताओं का महत्व अधिक था। वैदिक काल में 'उषा' की कल्पना देवी के रूप में की गयी है। ऋग्वेद के 'वाक्सूक्त', देवीसूक्त तथा रात्रिसूक्त में वाक् , पृथ्वी एवं रात्रि की देवी की कल्पना की गयी है एवं इन देवियों की स्तुति में मंत्रों की भी रचना की गयी है। ऋग्वेद में ही 'अदिति ' को 'चर' एवं 'अचर' की माता कहकर संबोधित किया गया है तथा पृथ्वी को भी माता माना गया है। इस पृथ्वी मां को प्राप्त कर धरतीवासी अपने को धन्य समझते हैं।
'अथर्ववेद' के पृथ्वी सूक्त में भी पृथ्वी को मानव मात्र की माता स्वीकार किया गया है। जीवन के प्रत्येक चरण में उसे अधिष्ठात्री देवी माना गया है। अथर्ववेद में ही 'विराज' नामक एक देवी का भी वर्णन मिलता है। उन्हें तीनों लोक की माता स्वीकार किया गया है तथा उनका तादत्म्य अदिति से भी स्थापित किया गया है। यही नहीं , उस देवी को 'स्वाहा' कहकर भी संबोधित किया गया है।
File Photo of:डाॅ० गणेश पाठक
वैदिक काल में पूजित मातृदेवी या मातृशक्ति की उपासना ही आगे चलकर शक्ति के विभिन्न स्वरूपों में प्रतिष्ठित हुई। उत्तर वैदिक कालीन ग्रंथों में उमा ,दुर्गा , अम्बिका एवं काली आदि नामों कि वर्णन मिलता है, जो शक्ति की देवी के रूप में ही प्रतिष्ठित हुई हैं।'वाजनेयी संहिता ' एवं तैतिरीय ब्राह्मण में अम्बिका को रूद्र की पत्नी माना गया है। 'केन उपनिषद ' में उमा को सम्पूर्ण ब्रह्मविद्या का रूप माना गया है। 'मुण्डकोपनिषद' में अग्नि की सात जिह्वा का उल्लेख आया है, जिसे काली, कराली, मनोजवा , सूतोहिता, सुद्युभुवर्णा, स्फुलिंगनी एवं विश्वरूचि कहकर संबोधित किया गया है।
'सूत्र साहित्य' में सर्व प्रथम 'दुर्गा' नामक देवी का उल्लेख मिलता है, जिसका वर्णन रूद्र की पत्नी के रूप में हुआ है। 'गुह्य सूत्रों' दुर्गा, भद्रकाली एवं भवानी आदि नामों का उल्लेख मिलता है।
'महाभारत' के 'दुर्गा स्रोत' एवं 'हरिवंश पुराण' के 'आर्यस्तवन' में शक्ति पूजा के विशद स्वरूप का वर्णन मिलता है। विभिन्न ग्रंथों में वर्णित शाक्य सम्प्रदायों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि देवी के इस विराट रूप में एक तरफ जहां वैदिक तत्व हैं, वहीं दूसरी तरफ वैदिकोत्तर तत्वों की भी प्रधानता है। जैसे - आर्या, कौशितकी, कात्यायनी आदि नाम वैदिक परम्परा कू द्योतक हैं, जबकि दूसरी तरफ देवी की उपासना बर्बर, शबर एवं पुलिंदों द्वारा की जाती थी, जिन्हें अर्पणा, नग्नशरी एवं पर्णवरी भी कहा गया है, जो वैदिकोत्तर परम्परा के द्योतक हैं।
'मार्कण्डेय पुराण' का 'देवी महात्म्य खण्ड' पौराणिक युग में शक्ति पूजा की परम्परा को स्वीकार करता है। इसमें देवी की स्तुति की गयी है और उन्हें श्रेष्ठ तथा मानव जगत की संरक्षिका शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
'सांख्य दर्शन' का 'प्रकृति' एवं 'पुरुष' का सिद्धांत भी जगदंबा आदि शक्ति का ही द्योतक है। महाभारत में देवी के पृथक अस्तित्व को स्वीकार किया गया है। 'हरिवंश पुराण' में 'कौशिकी' नाम की शक्ति की इस देवी को यशोदा की पुत्री माना गया है।
कौटिल्य की पुस्तक 'अर्थशास्त्र' के 'दुर्ग निवेश' नामक अध्याय में शिव, अपराजित आदि देवताओं के साथ देवी 'मंदिरा' के मंदिर निर्माण का वर्णन मिलता है। 'मंदिरा' या 'मीदुषी' को डाॅ० बनर्जी एक देवी मानते हैं एवं दुर्गा या शिव की पत्नी का पर्याय मानते हैं। यह सही भी प्रतीत होता है , क्यों कि दुर्गा ही विश्व की आधारभूत शक्ति हैं। यह दुर्गा ही आदि शक्ति के रूप में विष्णु में 'सात्विकी', ब्रह्मा में 'राजसी' एवं महेश में 'तामसी' शक्ति के रूप में निहित रहती हैं। दुर्गा ही आद्या शक्ति हके रूप में ब्रह्मा की सृष्ट शक्ति, विष्णु की पैषक एवं महेश की संहारक शक्ति तथा सूर्य की प्रकाश शक्ति, अग्नि की दाहक शक्ति एवं वायु की प्रेरक शक्ति के रूप में अपनी शक्ति का संचार करती रहती हैं। यही शक्ति अम्बिका, महिषासुर मर्दिनी, गौरी, काली आदि नामों से भी प्रतिष्ठित हुई है।
'स्कन्द पुराण' में वर्णन आया है कि 'शिव' 'शक्ति' के बिना 'शव' के समान हैं। शिव का शिवत्व महाशक्ति के सानिध्य में ही जाग्रत होता है, जैसा कि कहा भी गया है -
जगत्कारण मापन्न: शिवोयोमुनि सत्तम:।तस्यापि तामवच्छ क्रियस्तया हीनो निरर्थक: ।।
वेदों में भी भगवती देवी की स्तुति इस रूप में की गयी है -
' हे देवी, आप महामाया हैं, जगत की सृष्टि करना आप का स्वभाव है, आप से ही सम्पूर्ण जगत है , ओंकार में आप अर्द्धमाया हैं एवं गायत्री में आप ही प्रणव हैं।'
बंगाला साहित्य में भी ऐसा आख्यान मिलता है , जिसमें देवी की आद्या शक्ति का वर्णन है और उसे ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस आख्यान के अनुसार - ' सृष्ट से पूर्व ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश गंगा नदी के किनारे आद्याशक्ति की उपासना कर रहे थे। देवी सड़ी हुई लाश के रूप में उनके षमीप आयीं। देवी सबसे पहले विष्णु के पास गयीं तो विष्णु लाश के दुर्गन्ध से इतना बेचैन हो गये कि तत्काल ही उठ खड़े हुए। इसके बाद देवी ब्रह्मा के पास गयीं तो ब्रह्मा ने भी दुर्गन्ध से बचने हेतु अपना मुख दाहिनी तरफ घुमा लिया, फलत: वे दो मुख वाले हो गये और दोनों मुखों से दुर्गन्ध आने लगी। इस तरह इस दुर्गन्ध से उबकर ब्रह्मा पुन: अपना मुख घुमा लिए। इस तरह चारों दिशाओं में मुख घुमाने के कारण चतुर्मुख है गये और चारों मुख से दुर्गन्ध आने लगी, जिससे वे वहां से भाग खड़े हुए, किंतु महेश अंत तक अपने स्थान पर ही उपासना करते रहे, जिससे आद्या देवी प्रसन्न हो गयीं और महेश पंचमुखी हो गये।
उपर्युक्त आख्यान भी शक्ति की महत्ता को स्वीकार करता है और इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शक्ति ही सब कुछ है, शक्ति बिना कुछ भी नहीं, चाहें शक्ति की सत्ता हम जिस रूप में स्वीकार करें। वह आदि हैं , अनादि हैं, अनन्त हैं एवं सर्वत्र तथा सर्वज्ञ हैं।
शक्ति ही सर्वोपरि है, इस तत्थ को स्वीकार करते हुए ही प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजा रची - बसी है और इस शक्ति पूजा की परम्परा को अक्षुण रखने की दृष्टि से ही सम्भवत: देश के कोने - कोने में ५१ शक्ति पीठों की स्थापना की गयी, जो आज भी शक्ति पूजा के प्रधान केन्द्र बने हुए हैं।
शक्ति को अनेक नामों से पुकारा गया है। जैसे - माया, महामाया, प्रकृति, विद्या, अविद्या, व्यक्त, अव्यक्त , कुंडलिनी, महेश्वरी, आद्याशक्ति, आदिमाया, पराशक्ति, परमेश्वरी, जगदेश्वरी, तमस आदि शक्ति के ही पर्यायवाची हैं।
दुर्गासप्तशती में दुर्गा ( शक्ति ) के १०८ नामों की चर्चा की गयी है। वैसे शक्ति के तीन प्रधान स्वरूप हैं - महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली, जिनकी पूजा आदि अनादि काल से विभिन्न रूपों में होती चली आ रही है।
सम्पर्क सूत्र -
डाॅ० गणेश कुमार पाठक
श्रीराम विहार कालोनी, बलिया, उ० प्र०
पिनकोड - २७७००१
मो०- ८८८७७८५१५२

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