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    Today :25 सितम्बर को जयंती पर विशेष- समग्र विकास की पोषक हैं पंडित दीन दयाल उपाध्याय की विचारधाराएं : डाॅ० गणेश पाठक



    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
    बलिया उत्तरप्रदेश:--एकात्म मानववाद एवं अन्तोदय दर्शन के प्रणेता, स्वदेशी एवं आत्मनिर्भर विचारधारा के पोषक तथा भारतीयता  के संचारक परम् आदरणीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती पर कोटिश: नमन।
     
    पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जीवन दर्शन तथा उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत एवं विचारधाराएं आज के परिप्रेक्ष्य में विशेष रूप से उपादेय हो गयी हैं।
       पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का विचार था कि मानव का स्थाई, सतत एवं समग्र विकास होना चाहिए। उनकी स्वदेशी आर्थिक विचारधारा उनके एकात्म मानववाद के सिद्धांत पर ही आधारित है। उनका विचार था कि हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए , इस लिए मानव के प्रत्येक पक्ष अर्थात् समग्र विकास होना चाहिए।
         किसी भी देश के आर्थिक विकास में उस देश की संस्कृति, भौगोलिक स्थिति, भाषा, संसाधनों एवं विचारों का प्रभाव पड़ता है। पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी का आर्थिक चिंतन इन सभी कारकों को साथ लेकर चलने वाला "स्वदेशी आर्थिक चिंतन" है। इस सिद्धांत के मूल में  एकात्म मानववाद है , जो अपनी प्राचीन संस्कृति, सभ्यता एवं पारंपरिक नैतिक मूल्यों का समावेश है।
         पंडित जी का विचार था कि व्यक्ति की सम्पूर्ण आवश्यकताओं का विकास किए बिना कोई भी विचार भारत के समग्र विकास में सहायक नहीं हो सकता। इसीलिए उन्होने व्यक्ति के समग्र विकास हेतु "एकात्म स्वदेशी आर्थिक नीति " का विचार प्रस्तुत किया।
         पंडित जी का मानना था कि एकात्म मानववाद एवं अंतोदय के सिद्धांत को अपनाए बिना मानव कल्याण के लक्ष्यों को भारतीयता के मूल स्वरूप में प्राप्त करना संभव नहीं है। भारतीय चिंतन में भी आत्मा एवं मानव के समग्र विकास पर बल प्रदान किया गया है।
    File Photo of:डा.गणेश पाठक (पर्यावरणविद्)

    पंडित जी अर्थनीति के क्षेत्र में पुर्णरूपेण पाश्चात्य नकल करने के विरोधी थे। उनका कहना था कि अपनी अर्थनीति का भारतीयकरण करके के ही समग्र विकास के पथ पर अग्रसर हुआ जा सकता है।
         पंडित जी ने पूंजीवादी एवं साम्यवादी व्यवस्थाओं से त्रस्त विश्व के लिए ही एकात्म मानववाद के सिद्धांत का प्रतिपादन किया , जो न केवल व्यक्ति के जीवन के लिए सम्पूर्ण मानवजाति का चिंतन है , बल्कि एक संधारणीय एवं संपोषणीय माॅडल है।
           पंडित जी की पुस्तकों में स्वदेशी अर्थशास्त्र काज भरपूर समावेश हुआ है। "भारतीय अर्थनीति : विकास की एक दिशा" नामक पुस्तक तो स्वदेशी आंदोलन प्रतिरूप है। उनकी पुस्तक " बेकारी की समस्या एवं उनका हल " में भी स्वदेशी एवं आत्मनिर्भर भारत की  भरपूर चर्चा हुई है।
        पंडित जी को यदि प्रकृति पुरुष भी कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहुं होगी। वे प्रकृति संरक्षण के पोषक थे। वे प्रकृति के संतुलित दोहन के पक्षधर थे। वे प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि समुचित उपयोग केज्ञपज्ञधर थे। उनका कहना था कि वर्तमान अर्थव्यवस्था प्रकृति को असंतुलित कर रही है। उनका मानना था कि आर्थिक विकास का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों एवं पर्यावरण ज्ञको हानि पहुंचाए बिना वर्तमान एवं भावी पीढ़ियां के जीवन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर  होना चाहिए।
           पंडित जी द्वारा अपनी अर्थनीति में अर्थ चिंतन , भारतीय संस्कृति में अर्थ, आधार भूत लक्ष्य , प्राथमिकताएं, कृषि, उद्योग, मनुष्य एवं मशीन,पूंजी एवं प्रबंध , वस्तु एवं मांग , औद्योगिक प्राथमिकताएं, छोटे - बड़े उद्योग, यायात एवं व्यापार तथा समाज सेवाएं जैसे विषयों को विस्तार पूर्वक प्रस्तुत किया है।
         पंडित जी का मानना था कि कुटीर उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था काहमूल आधार है एवं विकेन्दित अर्थव्यवस्था विकास के लिए आवश्यक है। कुटीर उद्योग द्वारा ही प्रत्येक हाथ को काम मिल सकता है। हमें अपनी कृषि व्यवस्था को भी सुधार होगा।
       पंडित का विचार था कि भारत में मे ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित हो , जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था स्वालंबन की तरफ अग्रसर हो सके।
         पंडित जी का आर्थिक चिंतन आत्मनिर्भरता बढ़ाने वाला एवं निर्धनों का उत्थान करने वाला होना चाहिए।  एकात्म मानववाद सिद्धांत के आधार पर ही हम जीवन की सभी समस्याओं का विकास कर सकते हैं । इस प्रकार स्पष्ट है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की विचारधाराएं आधुनिक भारत के विकास के परिप्रेक्ष्य विशेष उपयोगी हो सकती हैं और न केवल मानव का बल्कि पूरे देश का समन्वित विकास किया जा सकता है।

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