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    दशहरा परब (भोजपुरी)डॉ. जयप्रकाश तिवारी



    ग्राम/पोस्ट भरसर, 

    उत्तर प्रदेश जिला बलिया
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
             

    बलिया उत्तरप्रदेश:---दशहरा परब हमनी के सनातन संस्कृति के सबले बड़का आउर खास परबन में से एक ह। दशहरा हमन के दुगो परंपरा से जुड़ल बा – एगो "शक्ति की पूजा" से, आउर दुसरका "राम (रामत्व) के विजय" वाली परंपरा से। एक ओर जहाँ महिषासुर जइसन असुरी प्रवृत्ति पर आत्मिक शक्ति से जीत के खुशी मनावल जाला, त दुसर ओर रावण जइसन अहंकारी, असत्य, अन्यायी पर "राम" और रामत्व के, सत्य के विजय के उल्लास मनावल जाला। एही से ए परब के "विजयादशमी" और "विजय पर्व" भी कहल जाला।

    पौराणिक कथा-पुराण में एकर अनेक संदर्भ मिलेला, बाकिर साहित्य की नजर से निराला जी की रचना "राम की शक्ति पूजा" बहुते प्रसिद्ध साहित्यिक रचना ह। कुल मिला के ई परब "शक्ति से शक्तिमान बने" के सिद्धांत ह। महिषासुर और रावण के बध के कहानी हमनी के ना सिरिफ मनोरंजन करावेला, बल्कि सिद्धांत के समझे अउर जीवन में ओह सिद्धांत उतारे के सुनहरा मौका भी देला। एहीसे हमनी के बड़ बुजुर्ग, विद्वान लोग ई परब - त्योहारन के परंपरा में जोड़ के रखले बाड़न, ताकि आवे वाली पीढ़ी एकर गूढ़ भाव समझ के समाज अउर जीवन में उतार सके।

    बालपन में ई सब परब बस तड़क-भड़क, मीठा-मिठाई आउर खेल के रूप में लागेला, बाकिर समझदार लोग खातिर ई शोध, विवेचन अउर आत्म-मूल्यांकन के समय ह। अगर हमनी के घर-परिवार में ई परब के सिद्धांत पक्ष के गंभीर चर्चा होखे लागी, तब जाके ई परब के असली मतलब समझ में आई। नाहीं त ई बस छोट लइकन वाला खेल तमाशा बन के रह जाई।

    *दशहरा: मूल्यांकन के दिन ह*
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    दशहरा के मतलब बा आपन खुद के आचरण के जांच परख करे के दिन। ई परब हमनी के सिखावेला कि पिछले एक बरिस में हमनी के का आचरण कइनी? अगर हमनी के मर्यादा, नीति अउर देशहित में चलनी त समुझ लीं कि सही माने में दशहरा मनवनी। नाहीं त ई बस लइकन वाला खेल भर बा, इकरा से अधिक ना।

    बड़ बुजुर्ग आदमी के बालबुद्धि राखल बड़ा शर्म के बात होखेला। बड़प्पन और इज्जत तबे मिली जब हमनी के पूड़ी, पकवान, कपड़ा आउर पटाखा से आगे बढ़ के विचार, सुमति अउर विवेक के प्रकाश में शास्त्रीय, मर्यादित आउर देशहित वाला व्यवहार करीं।

    "राम" आउर "रामत्व", "रावण" आउर "रावणत्व" के फर्क समझे के बहुती जरूरत बा। जब ई फर्क साफ होई, तबे ई दशहरा परब असली रूप में हमनी के भारतीय संस्कृति के विकास के कारण बन सकेला, आपन औचित्य सिद्ध कई सकेला।

    असली चिंतन, विचार से हमनी के देश में भौतिक आउर आध्यात्मिक विकास के संतुलन बनत जाई अउर भारत फेरू से “सोने के चिरई” बन सकेला, एहम कौन संदेह नइखे। एह खातिर जरूरी बा कि दशहरा के "रामत्व", "शिवत्व" आउर "शक्ति" के औचित्य से जोड़ के मनावल जाव।

    *शक्ति आउर शक्तिमान*
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    "शक्ति" का ह?– ई सत्य, विचार, मूल्य, संवेदना, न्याय आउर आचरण के शक्ति के प्रतीक ह। एह शक्ति के स्थापन खातिर शास्त्र (ज्ञान) आउर शस्त्र (बल) दुनों बहुती जरूरी बा। शास्त्र आउर शस्त्र एकही सिक्का के दू पहलु ह।

    पहिले समय में शास्त्र-पूजा राजपूत आउर क्षत्रिय समाज तक सीमित रह गइल, जबकि पहिले सब वर्ण में ई परंपरा विद्यमान रहे। परशुराम, विश्वामित्र आउर भृगु जइसन मनीषी लोग एह परंपरा के जीवंत उदाहरण हवे। जब से हमनी शास्त्र आउर शस्त्र के साथ छोड़ दीहनी, तब से हमनी के पतन, पराभाव शुरू हो गइल। एहीसे ई जरूरी बा कि हमनी ई दुनों चीज के अपनाईं जा।

    अगर राजनीति के चश्मा से नौ देखल जाव, त "अग्निवीर योजना" ए संदर्भ में एगो बढ़िया और सराहनीय कदम ह; जहाँ शिक्षा के बाद 4 साल के सैनिक प्रशिक्षण आउर प्राप्त धनराशि से युवक स्वावलंबी बन सकत बा। लेकिन अफसोस कि एकरा के राजनीतिक स्वार्थ खातिर बहुते बदनाम कर देहल गइल बा। आजू भी बहुत कम लोग एकड़ समर्थन करता। 

    ई चीज दशहरा जइसन महापर्व के अपमान ह। "भय बिनु होय न प्रीत" आउर " भय काहू को देट नहि, नहि भय मानत काहू" वाली उक्ति, आदर्श जीवन यापन के बहुत बढ़िया तरीका ह। "शास्त्र के ज्ञान" आउर "शस्त्र के बल से" ई आसानी से संभव बा। जब तक एह परब में "माला अउर भाला", "शास्त्र आउर शस्त्र", "मीरी-पीरी" के मेल ना होई, तब तक ई बस लइकन के खेल बन के रह जाई।

    एहीसे ई परब के राष्ट्र निर्माण आउर सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साधन बनावल जरूरी बा। रामलीला के आयोजन के मकसद भी ई रहे कि छोट - छोट लइकने के मनोरंजन भी होखे आउर बड़का लोग के अंदर के बुद्धि, चेतना जागे।

    *पुतला दहन*
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    दशहरा पर विचार-विमर्श के बाद सही-गलत, उचित-अनुचित के भेद समझला पर पुतला दहन के कार्यक्रम होला। बाकिर सवाल बा, केकरा पुतला के जलवल जाय? काहे जलवल जाय? 

    अगर ई बात सही से ना समझल गइल, त पुतला दहन प्रकरण खाली तमाशा बन के रह जाई। दस साल पहिले गायत्री परिवार ने लखनऊ में "दहेज दानव" के पुतला फूंकले रहे, बाकिर फेर कहीं दुबारा अइसन ना देखे के मिलल। आज जरूरत बा कि हमनी कर आपनौ अंदर के बुराई के पुतला फूंकीं जा। अगर हमनी के ईमानदारी से आपन बुराई सबके सामने लाके उनका के जलाईं जा, आउर फेर से ओकरा के ना दोहरावे के कसम खाईं जा, त ई सबसे बड़ा सामाजिक पुण्य के काम होई।

    हमनी के शास्त्रीय परब के शास्त्रीय तरीका से मनावे के चाहीं। ई हमनी के चरित्रवान, जिम्मेदार आउर कर्तव्यनिष्ठ बनावेला। अगर एही तरह ना भइल त हमनी के शिक्षित होखला के बावजूद रीढ़ विहीन जीव बन जाईब जा। बिना विवेक के "मानव बम" बन जइसन घातक आदमी बन जाइब जा, जे धन आउर मजहब खातिर कठपुतली बन के  आजू नाचत बा। ध्यान रखीं – धन के ई बड़का लालच आउर भोग के इच्छा कहीं हमनी के संस्कृति विरोधी, देशद्रोही ना बना दे।

    *निष्कर्ष*
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    हर परब के एक निश्चित विशेष उद्देश्य होला। हमनी के ओकरे गूढ़ मतलब, दर्शन अउर नीयत के समझे के जरूरत बा। ई  दसशहरा परब भी खाली पुतला जलावे, मिठाई खाए, अउर छुट्टी मनावे के दिन ना  हवे। चलिए आज एकजुट होके, संकल्प लेकर एकर असली उद्देश्य पूरा करे में लग जाईं जा। इहे ए परब के असली उद्देश्य हवे  और उद्देश्य पूरा कइल हमनी के सामूहिक जिम्मेदारी।
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