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    किशोरी जी का रुठना और नीलमणि का रहस्य.....



    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 

    बलिया उत्तरप्रदेश:---वृन्दावन की रसराज्य लीलाओं का वर्णन अपार है। एक दिन ललिता और विशाखा सखियाँ राधारानी के साथ निकुंज में बैठी थीं। उनकी चंचल आँखों में शिकायत और मन में ममता थी, पर मुख पर मौन। आज किशोरी जी श्यामसुंदर से कुछ रुठी हुई थीं।

    श्यामसुंदर आये—मुरली की मधुर धुन उनके अधरों पर थी, पीतांबर लहराता हुआ और कंठ में अद्भुत नीलमणि का हार दमक रहा था। वे बड़े उत्साह से राधिका के सम्मुख खड़े हुए।

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा:
    "प्रिये! व्रज की कान्तारिणी, लज्जा की मूर्ति, रस की अधिष्ठात्री राधे! आज तुम मुझसे क्यों रुष्टा हो? देखो न, मैंने अपने कंठ में यह नीलमणि धारण की है। क्या यह तुम्हें सुशोभित नहीं लगता?"

    राधा जी ने अधरों को भींचकर, नेत्रों को नीचे झुकाकर, धीमे स्वर में उत्तर दिया—
    "श्याम! मुझसे मत पूछो कि मैं क्यों रुठी हूँ। पहले तुम अपने इस नीलमणि की ओर देखो। इसमें मुझे तुम्हारी छवि नहीं, बल्कि किसी और की परछाईं दिखाई देती है।"

    इतना कहते ही सखियों ने भी कौतुहल से उस रत्न को निहारा। सचमुच, उस नीलमणि में एक गोपी का प्रतिबिंब झलक रहा था—गोपी की मुस्कान, उसका श्रृंगार, मानो श्यामसुंदर के समीप वही खड़ी हो।

    राधा जी के नेत्रों में आँसुओं की रेखा उभर आई।
    "श्याम! तुम्हारा यह नीलमणि मेरे विरह का साक्षी बन गया है। यदि इसमें किसी और का चित्र है, तो मैं तुम्हारे हृदय में अपने स्थान को कहाँ खोजूँ?"

    श्यामसुंदर मुस्कुराए, उन्होंने दोनों करों को जोड़कर किशोरी जी से कहा—
    "प्रियतम! यह नीलमणि कोई साधारण रत्न नहीं है। यह तो मेरे हृदय का दर्पण है। इसमें जो प्रतिबिंब तुम देख रही हो, वह किसी और का नहीं, तुम्हारा ही है।
    राधे! जिस प्रकार जल में चंद्रमा प्रतिबिंबित होता है, वैसे ही इस नीलमणि में मेरा जीवन, मेरा श्वास, मेरा प्राण केवल तुम्हारी छवि ही दिखाता है।"

    कृष्ण ने धीरे से राधा जी का हाथ थाम लिया।
    "राधे! यदि तुम्हें विश्वास न हो तो देखो—मैं आँखें मूँदता हूँ, पर भीतर और बाहर हर ओर तुम्हीं हो। यह गोपी का रूप तुम्हारी छवि का ही विविध खेल है। क्योंकि सम्पूर्ण व्रज की गोपियाँ तुम्हारी ही अंशरूपा हैं।"

    यह सुनकर किशोरी जी के नेत्र नम हो उठे, पर होठों पर हल्की मुस्कान उभर आई। उन्होंने लजाते हुए कहा—
    "श्याम! यदि सचमुच तुम्हारा हृदय मेरे प्रेम से परिपूर्ण है, तो इस नीलमणि को केवल मेरे चरणों में अर्पित करो।"

    श्यामसुंदर ने उसी क्षण नीलमणि उतारकर राधा जी के चरणों में रख दी और मुरली बजाते हुए बोले—
    "यह नीलमणि नहीं, मेरा हृदय है। और मेरा हृदय अब से सदा तुम्हारे चरणों की सेवा में रहेगा।"

    राधा जी की आँखों में संकोच और स्नेह का मिलन हुआ। उनका रुठना पलभर में ही पिघल गया और दोनों के बीच वह अद्वितीय माधुर्य प्रवाहित हुआ जो सम्पूर्ण व्रज को रस में डुबो देता है।

    शिक्षा✨
    यह कथा दर्शाती है कि राधा-कृष्ण का संबंध केवल मान-रूठ की लीला नहीं है, बल्कि हृदय की सत्यता और आत्मा की एकनिष्ठता का प्रतीक है। जब प्रेम सच्चा हो, तो हर दर्पण, हर रत्न और हर वस्तु में उसी प्रियतम का ही स्वरूप प्रतिबिंबित होता है।

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