उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश:--एक बार महाराज युधिष्ठिरने भीष्म पितामहसे पूछा— भरतश्रेष्ठ ! राजा एक दुर्लभ राज्यको पाकर भी यदि सेना-खजाना आदि साधनोंसे रहित हो तो वह अपनेसे बलमें सर्वथा बढ़े-चढ़े हुए शत्रुके सामने कैसे टिक सकता है ? इसपर भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर ! इस विषयमें समुद्र और नदियोंके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है।
एक समयकी बात है, सरिताओंके स्वामी समुद्रने सरिताओंसे अपने मनका एक सन्देह इस प्रकार पूछा— 'नदियो ! मैं देखता हूँ, जब तुमलोगोंमें बाढ़ आती है तो बड़े-बड़े वृक्षोंको जड़-मूल और डालियोंसहित उखाड़कर तुम अपने प्रवाहमें बहा लाती हो, किंतु उनमें बेंतका कोई पेड़ नहीं दिखायी देता। बेंतका शरीर तो नहींके बराबर — बहुत पतला होता है, उसमें कुछ दम भी नहीं होता और वह तुम्हारे खास किनारेपर जमता है; फिर भी तुम उसे न ला सकीं ! क्या कारण है ? उसे कमजोर समझकर उपेक्षा तो नहीं कर देतीं ? अथवा उसने तुमलोगोंका कुछ उपकार तो नहीं किया है ? क्यों बेंतका वृक्ष तुम्हारा तट छोड़कर नहीं आता ? इस विषयमें मैं तुम सब लोगोंका विचार जानना चाहता हूँ।'
यह सुनकर गंगाजीने युक्तियुक्त, अर्थपूर्ण तथा दिलमें बैठनेवाली बात कही— 'नाथ ! वे वृक्ष अपने स्थानपर अकड़कर खड़े रहते हैं, हमारे प्रबल प्रवाहके सामने सिर नहीं झुकाते, इस प्रतिकूल बर्तावके कारण ही उन्हें अपना स्थान छोड़ना पड़ता है। किंतु बेंत ऐसा नहीं है। वह नदीके वेगको आते देखकर झुक जाता है, वह समयके अनुसार बर्ताव करना जानता है, सदा हमारे अधीन रहता है, अकड़कर खड़ा नहीं होता; अतः अपने अनुकूल आचरणके कारण उसको स्थान छोड़कर यहाँ नहीं आना पड़ता। जो पौधे, वृक्ष या लता-गुल्म आदि हवा और पानीके वेगसे झुक जाते तथा वेग शान्त होनेपर सिर उठाते हैं, उनका कभी तिरस्कार नहीं होता।'
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर ! इसी प्रकार जो राजा बलमें बढ़े-चढ़े तथा विनाश करनेमें समर्थ शत्रुके पहले वेगको सिर झुकाकर नहीं सह लेता, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जो बुद्धिमान् अपने तथा शत्रुके सार, असार, बल और पराक्रमको जानकर उसके अनुसार बर्ताव करता है, उसकी कभी पराजय नहीं होती —
सारासारं बलं वीर्यमात्मनो द्विषतश्च यः ।
जानन् विचरति प्राज्ञो न स याति पराभवम् ॥
महा० शान्ति० ११३।१३
अतः जब शत्रुको बलमें अपनेसे बहुत बढ़ा हुआ समझे तो विद्वान् पुरुषको बेंतकी तरह नम्र हो जाना चाहिये। यही बुद्धिमानीका लक्षण है। नीतिकी यह बात मात्र राजाओंके लिये ही नहीं, सामान्य मनुष्यके लिये भी उतनी ही सत्य है।

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