देश विदेश
इनपुट:सोशल मीडिया
देश विदेश:---डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलता है तो यह अमेरिका का अपमान होगा। ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यों की आलोचना की और पूछा कि क्या कर रहा है।*
*ट्रंप के लिए नोबेल मांगने वाले पाकिस्तान ने दिया झटका, गाजा शांति प्रस्ताव से किया किनारा*
* पाकिस्तान अमेरिका के 20 सूत्रीय गाजा शांति प्रस्ताव से पीछे हट गया है.
* यह वहीं पाकिस्तान है जिसने कुछ समय पहले ट्रम्प के लिए नोबल शांति पुरस्कार की मांग की थी.
* पाक के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने औपचारिक रूप से देश को इस प्रस्ताव से अलग करते हुए बयान दिया है.
* पाक के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि, यह दस्तावेज हमारा नहीं है और इसमें हमारे मूल मसौदे में बदलाव किए गए हैं.
* डार ने संसद में यह बयान दिया जिससे पाकिस्तान इस प्रस्ताव से आधिकारिक तौर पर दूरी बनाने वाला पहले देश बन गया है.
*यूरोपीय बैठक में ट्रंप की किरकिरी, गलतियां बनी ठहाकों की वजह, नोबेल प्राइज का दावा और गलत नामों पर नेताओं के तंज*
* ट्रंप ने हाल ही एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अजरबैजान को 'अबेर-बैजान' बोल गए थे और बार-बार अजरबैजान–अल्बानिया के बीच युद्ध खत्म कराने का दावा करते रहे
* इससे पहले भी उन्होंने कंबोडिया और आर्मेनिया के बीच झगड़ा खत्म करने जैसी काल्पनिक बातें कही थीं
* जबकि दोनों देशों का कोई ऐतिहासिक विवाद नहीं है
* यूरोपियन पॉलिटिकल कम्युनिटी की मीटिंग में अल्बानिया के प्रधानमंत्री एडी रामा ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव से मजाक करते हुए कहा कि ट्रंप ने हमारे बीच ‘पीस डील’ कराई थी. इस पर अलीयेव जोर से हंस पड़े और मैक्रों ने भी मजाकिया अंदाज में ‘सॉरी’ बोल दिया.
*असल में, ट्रंप बार-बार आर्मीनिया और अल्बानिया में कन्फ्यूज होते रहे हैं. दिलचस्प बात ये है कि अल्बानिया अमेरिका से 342 गुना छोटा देश है, और उसके प्रधानमंत्री ने भरी महफिल में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के राष्ट्रपति को हंसी का पात्र बना दिया.*
■ डोनाल्ड ट्रंप जिस नोबेल शांति पुरस्कार के लिए पिछले कार्यकाल से जोर लगा रहे हैं, कुछ ही दिनों में उसकी घोषणा होने वाली है. बकौल ट्रंप, उन्होंने सात युद्ध रोके इसलिए ये शांति पुरस्कार उनका होना चाहिए. पहले टर्म में भी वे खुद को मजबूत दावेदार मानते रहे.
■ डोनाल्ड ट्रंप का लॉन्ग टर्म गोल रहा, नोबेल पीस प्राइज हासिल करना. वे दावा कर रहे हैं कि उनकी वजह से बड़े-बड़े युद्ध रुक या टल गए, जो परमाणु जंग में बदल सकते थे. अपने इस शांति अभियान के हवाले से वे बार-बार नोबेल की इच्छा जताते रहे. रिजल्ट का दिन करीब आने के साथ ही ट्रंप आक्रामक हो चुके. वे कह रहे हैं कि उन्हें पुरस्कार न मिलने का मतलब अमेरिका का अपमान है.
■ ट्रंप पिछले महीनों में कई बार दोहरा चुके कि उनकी ट्रेड डिप्लोमेसी ने कई देशों में जंग रुकवाई. यहां तक कि वे भारत-पाकिस्तान लड़ाई को भी रोकने का श्रेय लेते रहे, जबकि भारत ने हर बार इससे इनकार किया.
■ दरअसल नोबेल कमेटी पूरी तरह से तटस्थ होकर फैसला लेती है. नॉर्वे की संसद की बनाई हुई पांच सदस्यीय कमेटी में पुरस्कारों के लिए जनवरी में नॉमिनेशन बंद हो जाता है. इसके बाद सैकड़ों या हजारों नामों में से छंटनी होती है.
■ विशेषज्ञों की एक टीम इन नामांकनों की गहराई से जांच करती है. वे देखते हैं कि उम्मीदवार का शांति में कितना योगदान रहा और इसका असर कितना लंबा होगा. प्रोसेस महीनों चलती है. ये भी चेक किया जाता है कि क्या नाम के पीछे राजनीतिक जोर है या जेनुइन है. फिर कमेटी बंद कमरे में बैठकर वोटिंग करती है. सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विजेता होता है.
■ ट्रंप का नोबेल प्राइज पाने का सपना नया नहीं है. वह पहले भी कई बार कह चुके हैं कि ‘सब कहते हैं मुझे नोबेल मिलना चाहिए.’ उन्होंने दावा किया है कि उन्होंने ‘सात युद्ध खत्म किए हैं’ और अब आठवां युद्ध यानी इजराइल-हमास की लड़ाई रोकने की कोशिश में हैं.
■ डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल पुरस्कार मिलना मुश्किल है. ट्रंप कई बार नोबेल के लिए नामांकित हो चुके हैं. लेकिन इसके बावजूद उनकी उम्मीदें कम हैं. ओस्लो की नोबेल कमेटी ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देती है जो जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मानवता के मूल्यों को आगे बढ़ाते हैं.
*ट्रंप के विवादित बयानों और वैश्विक संस्थाओं के प्रति उनके रुख के कारण उनके लिए यह रास्ता कठिन है. नॉर्वे की पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की निदेशक नीना ग्रेगर ने कहा, ‘ट्रंप की भाषा और रवैया शांति की भावना से मेल नहीं खाता. इसलिए इस साल उनके जीतने की संभावना बहुत कम है.’*

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