उत्तर प्रदेश बलिया/लखनऊ
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश लखनऊ:---रामायण में "धनुष यज्ञ" एक रोचक और बहुआयामी प्रसंग है जहां "राम और परशुराम" का संवाद है। परशुराम जी को एक प्रतापी, अत्यंत क्रोधी, अहंकारी किंतु एक न्यायी योद्धा और उग्र तपस्वी के रूप में दिखाया गया है, जो अन्यायियों के प्रति घृणा, विद्वेष भाव रखते हैं, उनका संहार करते हैं। रामायण में परशुराम जी को भीमकाय, जटाजूटधारी और गठीले शारीरिक शौष्ठववाले तेजस्वी, तपस्वी योद्धा रूप में वर्णन मिलता है। उनका आगमन बालकाण्ड सर्ग 74वा के श्लोक संख्या 17-19 में तब होता है, जब श्रीराम द्वारा "शिवधनुष भंग" के बाद चारों भाइयों का शुभविवाह सकुशल संपन्न होने के उपरांत राजा दशरथ सपरिवार वापस अयोध्या लौट रहे होते है। राजा दशरथ ने ही मार्ग में जटाजूटधारी परशुराम जी को अपनी ओर आते हुए भयाक्रांत विकराल रूप में देखा था। महर्षि बाल्मीकि के शब्दों में देखिए - "*ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम्। भार्गवं जामदग्नेयं राजा राजविमर्दनम्।। कैलाशमिव दुर्घर्ष कालाग्निमिव दु:सहम्। ज्वलंतमिव तेजो भिदुर्निरीक्ष्यं पृथग्जनै:।। स्कन्धे चासज्ज्य परशुं धनुर्विद्युदगणोपमम। प्रगृह्य शरमुग्रं च त्रिपुरघ्न यथा शिवम्।।" परशुराम जी का यह रूप देखकर महर्षि वशिष्ठ आदि तपस्वीगण भी आशंकित होकर आपस में वार्तालाप करते हैं कि क्षत्रियों का अनेकबार विनाश करके अपना क्रोध शांत कर लेने के उपरांत भी क्या पुनः अब भी अपने पिता ऋषि यमदग्नि के वध से अमर्ष के वशीभूत हो क्षत्रियों का संहार तो नहीं कर डालेंगे...? ऐसा सोचकर इस आशंका से निर्मूल होने के लिए उपस्थित सभी ऋषि-मुनियो ने भृगुनंदन परशुराम जी को अत्यन्त श्रद्धापूर्वक अर्घ्य लेकर विनयभाव से पूजन किया और राम! राम! कहकर उनसे अत्यंत मृदुल वाणी में मधुर वार्तालाप किया - "एवमुक्तवा अर्घ्यमादाय भार्गवं भीमदर्शनम्। ऋषियो राम रामेति मधुरं वाक्यम ब्रुवन।। (74वा सर्ग, 23)।
इस आतिथ्य पूजन को स्वीकार करके यमदग्निपुत्र परशुराम जी ने अब दशरथनंदन श्रीराम से सीधे ही कहा - "प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिदत्तां प्रतापवान। रामं दाशरथिं रामो जामदग्नौsअभ्यभाषत"(24)।। हे दशरथनंदन वीरवर राम! मैने सुना है कि तुम्हारे पराक्रम बड़े ही अनोखे और अद्भुत हैं। तुम्हारे द्वारा सुप्रसिद्ध "शिव-धनुष" को तोड़े जाने का समाचार भी मैं सुन चुका हूँ। उस धनुष को तोड़ना वास्तव में बहुत ही अद्भुत और अचिंत्य है। अब मैं अपना उत्तम "विष्णु-धनुष" साथ लेकर आया हूं। तुम इसकी प्रत्यंचा खींचकर इसके ऊपर बाण चढाओ! और अपने बल और कौशल का प्रदर्शन करो! इसे देखकर, तुम्हारा बल परखकर ही मैं तुझे द्वंद्व-युद्ध प्रदान करूंगा - "*तदहं ते बलं दृष्टवा धनुषोsप्यस्य पूरणै। द्वंद्व युद युद्धम प्रदास्यामि वीर्य श्लाघ्यमहं तव।।"* यह सुनकर राजा दशरथ के मुंह पर भय और विषाद की लहर छा गई। वे हाथ जोड़कर दीनभाव से विनती करने लगे। हे ब्राह्मण देव! आप तप, व्रत और स्वाध्याय से सदा शोभायमान होने वाले उत्तम भृगुवंश ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए हैं, आप महान तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी हैं...। आपने तो देवराज इन्द्र के समक्ष प्रतिज्ञा करके अपने शास्त्रों का परित्याग भी कर दिया है। हे ब्राह्मण देव! कृपा करके आप मेरे बालक पुत्र को अभयदान देने की कृपा करें - "बालानाम् मम पुत्राणामभयं दातुमर्हसि"। किंतु परशुराम जी ने राजा दशरथ की इन बातों को अनसुना कर दिया और राम से वार्तालाप जारी रखा। "सुनो राम! शत्रुनगरी पर विजय पानेवाले इस "वैष्णव धनुष" को भगवान विष्णु ने भृगुवंशी ऋचीक मुनि को उत्तम धरोहर के रूप में दिया था। ऋचीक मुनि ने अपने पुत्र और मेरे पिता महात्मा यमदग्नि को यह दिव्य धनुष दिया था।" इसे बाल्मीकि के शब्दों में देखें -"इदं च वैष्णवं राम धनु: पर पुरांजयम्। ऋचीके भार्गवे प्रदाद विष्णु: स न्यासमुत्तम्।। ... पितुर्मम ददौ दिव्यं जमदग्नेर्महात्मान:"(21-22)। इस प्रकार यह महान दिव्य धनुष मेरे ही परिवार की धरोहर है। इस दिव्य धनुष को क्षत्रिय धर्म के नाते तुम अपने हाथों में लो और उसपर बाण चढ़ाओ! यदि तुम ऐसा कर सको तो मैं तुमको द्वंद्व-युद्ध का अवसर दूंगा। "तदेवं वैष्णवं पितृपैतामहं महत्। क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गृहीष्व धनुरुत्तम्।। योजवस्य धनु:श्रेष्ठे शरं परपुरंजयम्। यदि शक्तोsसि काकुकुत्स्थ द्वन्द्व दास्यामि ते तत:" (27-28)।
File Photo of: डॉ जयप्रकाश तिवारी
श्रीराम का प्रत्युत्तर:
श्रीराम ने जो अबतक मौन प्राय थे, अब पहलीबार परशुराम जी से बोले - "वीर्यहीनमिवाशक्त क्षत्रधर्मेंण भार्गव। अवजानासि में तेज: पश्य मेsद्य पराक्रमम्।। इत्युकत्वा राघव: क्रुद्धो भार्गवस्य वरायुधम्। शरं च प्रतिजग्राह हस्ताल्ल्लघुपराक्रम: (76वा सर्ग, 4)। हे भार्गव! मैं क्षत्रिय धर्म से युक्त होकर भी विनीत हूं, विनम्र हूं, फिर भी आप मेरा तिरस्कार और अपमान कर रहे हैं। अब आप मेरा तेज और पराक्रम भी देखिए। ऐसा प्रत्युत्तर देकर पराक्रमी श्रीराम ने कुपित होकर परशुराम जी के हाथ से वह धनुष-बाण ले लिया। धनुष की प्रत्यंचा पर बाण रखा और कहा - "हे भृगुनन्दन! आप ब्राह्मण होने के नाते पूज्य हैं तथा ऋषि विश्वामित्र जी के साथ भी आपके संबंध हैं, इन सबके कारण इस संहारक बाण को आप पर नहीं छोड़ सकता। मेरा विचार है कि आपको जो शीघ्र विचरण करने की अदभुत शक्ति प्राप्त है उसे ही नष्ट कर दूं अथवा कहें तो आपके अर्जित तपोबल और सिद्धियों को ही नष्ट कर दूं?"
इधर वैष्णव धनुष हाथ में लेते ही परशुराम जी का वैष्णव तेज श्रीराम में समाहित हो जाने के कारण वीर्यहीन, तेजहीन जमदग्निनंदन जड़वत होकर हतप्रभ हो गए। वे सोचने लगे और श्रीराम से कहा - "हे रघुनंदन! मैं कश्यप जी से वचनबद्ध होने के कारण रात्रि निवास पृथ्वी पर नहीं करता, इसलिए मेरी गमन शक्ति को नष्ट न करें। मैं मन के वेग़ से महेंद्र पर्वत पर चल जाऊंगा। आप मेरी तपस्या जनित अर्जित शक्तियों को ही इस बाण से नष्ट कर दें।" (5-16)।
परशुराम जी ने श्रीराम को विष्णुरूप में पहचाना:
उग्र स्वभाव वाले परशुराम जी के क्रोध भाव का शांत होकर विनम्र भाव में परिवर्तित हो जाना सर्वसाधारण के मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न करता है कि ऐसा कैसे हुआ? क्यों हुआ?। परशुराम जी ने स्वयं इस जिज्ञासा का शमन किया है। वे श्रीराम को संबोधित करते हुए कहते हैं - "हे परंतप! हे वीरवर! मैने आपको पहचान लिया है। आपने जिस सरलता से धनुष की प्रत्यंचा को चढ़ा दिया था, उसी समय मुझे ज्ञात हो गया कि आप मधु दैत्य का अंत करनेवाले अविनाशी देवेश्वर विष्णु ही हैं" - (त्वया त्रैलोक्यनाथ हरि:), आपका कल्याण हो! कल्याण हो!! हे काकुत्स्थकुलभूषण! आपके समक्ष जो मेरी असमर्थता प्रकट हुई है, यह मेरे लिए लज्जाजनक कदापि नहीं हैं क्योंकि मुझे किसी मानव ने नहीं, मुझे आप त्रिलोकीनाथ स्वयं श्रीहरि विष्णु जी ने पराजित किया है। बाल्मीकि जी ने इस प्रकरण का वर्णन करते हुए लिखा - "अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि सुरेश्वरम। धनुषोsस्य परामर्शात् स्वस्ति तेsस्तु परंतप।। न चेयं मम काकुत्स्थ ब्रीडा भवितुमर्हति। त्वया त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृत:"।।(17-19)
इस घटना के उपरान्त श्रीराम ने यमदग्नि कुमार परशुराम जी का विधिवत पूजन किया। उनसे पूजित होकर परशुराम जी पुनः तप-साधना के लिए श्रीराम की परिक्रमा करके महेंद्र पर्वत पर चले गए। "रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्य: प्रपूजित:। तत: प्रदक्षिणीकृत्य जगामात्मगतिं प्रभु:।।"(24) यहां परशुराम जी का प्रसंग पूरा हो जाता है और वे पुन: दृष्टिगत नहीं होता।
आदिकवि महर्षि बाल्मीकि जी को कोटिश: नमन।

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