उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश:--महाभारतके युद्धमें आज अर्जुन तथा कर्ण आमने-सामने थे। एक-दूसरेको मार डालनेका प्रयास चल रहा था। सहसा कौरवोंकी प्रेरणासे कर्ण पूरी शक्ति लगाकर लगातार बाणोंकी वर्षा करने लगा। यह देख अर्जुन क्रोधसे जल उठे। उन्होंने अनेक दमकते हुए बाण मारकर कर्णके मर्मस्थानोंको बींध डाला। इससे उसे बड़ी पीड़ा हुई, वह विचलित हो उठा; किंतु किसी तरह धैर्य धारणकर रणभूमिमें डटा रहा। इतना ही नहीं, दुर्योधनको अपने जिन दो हजार कौरव-वीरोंपर बड़ा गर्व था, उन्हें भी अर्जुनने रथ, घोड़े और सारथिसहित मौतके मुखमें पहुँचा दिया। शेष बचे हुए कौरव वीर भयभीत होकर धनुषसे छोड़ा हुआ बाण जहाँतक न पहुँच सके, उतनी दूरीपर जाकर खड़े हो गये। कर्ण अकेला रह गया। उसने परशुरामजीसे प्राप्त आथर्वण अस्त्रका प्रयोग करके अर्जुनके अस्त्रोंको शान्त कर दिया। अर्जुन और कर्ण आमने-सामने थे। युद्ध करते समय वीरता, अस्त्र संचालन, मायाबल तथा पुरुषार्थमें कभी सूतपुत्र कर्ण बढ़ जाता था, तो कभी अर्जुन। दोनों एक-दूसरेपर तीव्र गतिसे प्रहार कर रहे थे। जो लोग युद्ध देख रहे थे, वे दोनोंकी प्रशंसा अपने-अपने अनुसार कर रहे थे।
युद्ध करते-करते कर्ण जब किसी भी तरह अर्जुनसे बढ़कर पराक्रम न दिखा सका तो उसे अपने सर्पमुख बाणकी याद आयी। वह बाण बड़ा भयङ्कर था, आगमें तपाया होनेके कारण वह सदा देदीप्यमान रहता था। अर्जुनको ही मारनेके लिये कर्णने उसे बड़े यत्नसे और बहुत दिनोंसे सुरक्षित रखा था। वह नित्य उसकी पूजा करता और सोनेके तरकशमें चन्दनके चूर्णके अन्दर उसे रखता था। उसने सोचा कि अर्जुनपर इसके बिना विजय पाना कठिन है। इसलिये उसने पूर्ण उत्साहके साथ उसी बाणको धनुषपर चढ़ाया और अर्जुनकी ओर ताककर निशाना ठीक किया। उस समय कर्णके सारथि शल्यने जब उस भयङ्कर बाणको धनुषपर चढ़ा हुआ देखा तो कहा— 'कर्ण ! तुम्हारा यह बाण अर्जुनके कण्ठमें नहीं लगेगा; जरा सोच-विचारकर फिरसे निशाना ठीक करो, जिससे यह मस्तक काट सके।' यह सुनकर कर्णकी आँखें क्रोधसे उद्दीप्त हो उठीं। वह शल्यसे बोला— 'मद्रराज ! कर्ण दो बार निशाना नहीं साधता। मेरे-जैसे वीर कपटपूर्वक युद्ध नहीं करते।' यह कहकर कर्णने जिस सर्पमुख बाणकी वर्षोंसे पूजा की थी, उस बाणको अर्जुनकी ओर छोड़ दिया और अर्जुनका तिरस्कार करते हुए उच्च स्वरमें कहा— 'अर्जुन ! अब तू मारा गया।'
कर्णके धनुषसे छूटा हुआ वह बाण अन्तरिक्षमें पहुँचते ही प्रज्वलित हो उठा। सैकड़ों भयङ्कर उल्काएँ गिरने लगीं। इन्द्रादि सम्पूर्ण लोकपाल हाहाकार कर उठे। इधर जिसके चतुर सारथि भगवान् श्रीकृष्ण हों उसे भला कौन मार सकता था ? श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें खेल-सा करते हुए अर्जुनके रथको तुरन्त ही पैरसे दबाकर उसके पहियोंका कुछ भाग पृथ्वीमें धँसा दिया। घोड़ोंको भी जरा-सा झुका दिया। भगवान्का यह कौशल देखकर आकाशमें स्थित अप्सराएँ, देवता और गन्धर्व फूलोंकी वर्षा करने लगे। कर्णका छोड़ा हुआ वह बाण रथ नीचा हो जानेके कारण अर्जुनके कण्ठमें न लगकर मुकुटमें लगा। यह वही मुकुट था जिसे ब्रह्माजीने बड़े प्रयत्न तथा तपस्यासे इन्द्रके लिये तैयार किया था और इन्द्रने अर्जुनको पहनाया था। वही मुकुट जीर्ण-शीर्ण होकर जलता हुआ जमीनपर जा गिरा। किरीटधारी अर्जुन साफाधारी हो गये, पर चतुर सारथिके चातुर्यसे सर्पमुख बाण विफल हो गया।

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