उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: धीरज यादव
दुबहर, बलिया:-- क्षेत्र के ओझा कछुआ उग्रसेनपुर गांव स्थित लखन बाबा समाधि मठिया के समीप आयोजित नवदिवसीय अभिषेकात्मक रुद्र महायज्ञ के पांचवें दिन श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। अयोध्या धाम से पधारे सुप्रसिद्ध कथावाचक शक्तिपुत्र बुलेट बाबा ने देवी सती के पुनर्जन्म और माता पार्वती के दिव्य चरित्र की कथा का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया।
कथा के दौरान उन्होंने कहा कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में पति महादेव का अपमान सहन न होने के कारण योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया, तो संपूर्ण ब्रह्मांड शोक में डूब गया। भगवान शिव विरक्त होकर गहरी समाधि में चले गए। परंतु सृष्टि के कल्याण और तारकासुर के अत्याचार से मुक्ति के लिए देवी का पुनः लौटना आवश्यक था। बुलेट बाबा ने बताया कि वही सती माता अपने अगले जन्म में राजराजेश्वर हिमालय और माता मैनावती के घर कन्या रूप में अवतरित हुईं। पर्वतराज के घर जन्म लेने के कारण उन्हें 'पार्वती' और शैल (पर्वत) की पुत्री होने के कारण 'शैलपुत्री' कहा गया। शिव जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने महलों के सुख-वैभव को त्याग कर घोर तपस्या की। उन्होंने प्रथम चरण में केवल कंद-मूल और फल खाकर हजारों वर्ष व्यतीत किए। द्वितीय चरण में पत्तों का भोजन भी त्याग दिया, जिसके कारण उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा। तृतीय चरण में उन्होंने निराहार रहकर, कड़कती ठंड और भीषण गर्मी की परवाह किए बिना केवल वायु का सेवन करते हुए शिव जी की आराधना की। कथावाचक ने भावुक होते हुए कहा कि माता पार्वती की इस निश्छल और कठोर भक्ति ने महादेव के वैराग्य को भी पिघला दिया। भगवान शिव ने परीक्षा लेने के लिए स्वयं बटुक रूप धारण किया और शिव जी की तमाम कमियां गिनाईं, परंतु पार्वती जी अपने मार्ग से टस से मस न हुईं। पार्वती जी के इस अनन्य प्रेम और अडिग निश्चय को देखकर भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद हिमाचल नगरी में दोनों का दिव्य विवाह संपन्न हुआ।
कथा के अंतिम चरण में वर्तमान सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हुए व्यास पीठ से बुलेट बाबा ने बेटी के जन्म के महत्व पर विशेष चर्चा की। उन्होंने आज के समाज में पैर पसार रही भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथा पर गहरी चिंता और आक्रोश व्यक्त किया। कहा कि आजकल लोग स्वार्थ और अज्ञानता वश बेटियों को गर्भ में ही मार दे रहे हैं। यह न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि एक घोर महापाप है। लोग भूल जाते हैं कि जिस जगदम्बा की हम पूजा करते हैं, वे भी एक बेटी के रूप में ही हिमालय राज के घर आई थीं। यदि समाज में बेटियां ही नहीं रहेंगी, तो सृष्टि का आगे बढ़ना असंभव है। उन्होंने कहा कि "बेटियां संस्कार की सृजन और सृष्टि की मूरत हैं।"

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