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    आख़िर भगवान शिव को हलाहल विष पीने की आवश्यकता क्यों पड़ी?



    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
    बलिया उत्तरप्रदेश:--हम सभी भगवान शिव को "नीलकंठ महादेव" के नाम से जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका कंठ नीला क्यों हुआ और वे "नीलकंठ" कैसे कहलाए।

    भागवत पुराण के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया, तब सबसे पहले अमृत नहीं, बल्कि हलाहल (कालकूट) विष प्रकट हुआ। उसका प्रभाव इतना भयंकर था कि उसकी ज्वाला से तीनों लोक संकट में पड़ गए। न देवता उसे धारण कर सके और न ही असुर।

    तब सभी भगवान शिव की शरण में पहुँचे।

    भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि "समर्थ का धर्म है कि वह संकट में पड़े प्राणियों की रक्षा करे।" समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए उन्होंने स्वयं उस विष को ग्रहण करने का निर्णय लिया।

    लेकिन एक बात बहुत कम लोग जानते हैं...

    भगवान शिव ने उस विष को अपने शरीर में फैलने नहीं दिया। माता पार्वती ने भी उस विष को उनके कंठ से नीचे नहीं जाने दिया। इसलिए वह विष उनके कंठ में ही स्थिर हो गया, जिससे उनका कंठ नीलवर्ण हो गया। तभी से भगवान शिव "नीलकंठ महादेव" कहलाए।

    यही कारण है कि "नीलकंठ" केवल भगवान शिव का एक नाम नहीं, बल्कि उनके त्याग, करुणा और लोककल्याण का प्रतीक है। उन्होंने अमृत पाने के लिए नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए संसार का सबसे भयानक विष अपने कंठ में धारण किया।


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