उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट:धीरज यादव
बलिया:-- पूरे विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां गुरु की पूजा ईश्वर से पहले होती है। भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान प्रदान किया गया है। "गुरु शरीर नहीं, ज्ञान है।"
गुरु! भक्ति का आधार ही नहीं बल्कि संस्कृति का सृजन और विकृतियों का विनाशक है। सद्गुरु के मुख से निकला एक-एक शब्द ब्रह्म वाक्य होता है। ब्रह्म ज्ञान एक बीज है, जिसे सद्गुरु कृपा करके इंसान के हृदय में बोते हैं और सहजावस्था इसका फल है। इसके लिए सत्संग रूपी जल, सेवा रूपी खाद देनी पड़ती है। सुमिरन रुपी संभाल करनी होती है, तभी यह बीज अंकुरित होकर पौधा बनता है। और आगे चलकर एक फलदार वृक्ष बन जाता है।
सद्गुरु जीवन जीने की कला सिखाता है। इनके ज्ञान से जीवन में निखार आता है। गुरु नाव में बैठे नाविक के समान है, जो अपने तरीके से इंसान को जीवन रूपी नाव में बैठाकर यानी ब्रह्मज्ञान देकर इस किनारे से उस पार पहुंचा देता है। बिना गुरु ज्ञान के भवसागर से पार होना असंभव है। ज्ञान ले लेना ही नहीं, ज्ञान के अनुसार कर्म करना भी जरूरी है। ज्ञान और कर्म रूपी दोनों पंखों के सहारे ही इंसान जीवन की ऊंचाइयों की ओर उड़ान भर सकता है।
गुरु और शिष्य का नाता साधारण सांसारिक नाता नहीं बल्कि पूर्णरूपेण आत्मिक व आध्यात्मिक नाता है। आध्यात्मिक शिक्षा भ्रष्ट और बेईमान होने से रोकती है। सम्पूर्ण तीर्थों का फल गुरु सेवा मात्र से प्राप्त होता है। गुरु के चरणों में श्रद्धा और प्रेम रखने वालों को कभी भव बंधन नहीं सताता।
🙏आध्यात्मिक परंपरा की संवाहक *गुरु पूर्णिमा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं....बब्बन विद्यार्थी🙏

TREND