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    स्वतंत्रता दिवस पर विशेष:--"स्वतंत्रता के बिना जीवन व्यर्थ है" : बब्बन विद्यार्थी



    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट:धीरज यादव 

    बलिया:-- स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। स्वतंत्रता के बिना जीवन व्यर्थ है। पराधीन मनुष्य न तो सुखी रह पाता है और न ही अपनी इच्छाओं के अनुकूल जीवन व्यतीत कर पाता है। हमारा देश भारत सदियों की परतंत्रता के बाद 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था। इसी के उपलक्ष में इस दिन को हम हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। यह हमारा राष्ट्रीय त्योहार है।

    भारत का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इस लंबे इतिहास में इसे कई विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा। अधिकतर विदेशी आक्रमणकारी यहां रहने के दौरान भारतीय सभ्यता-संस्कृति में इस तरह घुल-मिल गए, मानो वे यहीं के मूल निवासी हों। यह सिलसिला मध्यकालीन मुगलों के शासन तक चलता रहा। अठारहवीं सदी में जब अंग्रेजों ने भारत के कुछ हिस्सों पर अधिकार जमाया, तो पहली बार यहां के लोगों को गुलामी का एहसास हुआ। अब तक सभी विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को अपना देश स्वीकार कर यहां शासन किया था, किंतु अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार करने के बाद अपने देश इंग्लैंड को धन-धान्य से संपन्न करने के लिए इसका पूरा-पूरा शोषण करना शुरू किया। हिंदुस्तान में अंग्रेजी साम्राज्य का बोलबाला था। अंग्रेजों के सामने नत्मस्तक होकर चलना पड़ता था। जिस किसी ने गोरों के खिलाफ बोलने की हिम्मत की, उसकी बोली गोली से दबा दी जाती। भरा-पूरा हिंदुस्तान उजाड़ हो चला था। सारे हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाने के लिए जाल फैला दिए गए थे। शिक्षा में सर्वश्रेष्ठ देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाए रखने के पक्के इरादे बांध लिए थे। भारत माता गुलामी की जंजीरों में कराहने लगी।

     कभी न अस्त होने वाली अंग्रेजी हुकूमत में चारों ओर हाहाकार मचा था। उस समय 1857 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गाजीपुर जनपद, बलिया तहसील के नगवा गांव में 30 जनवरी 1831 को जन्मे मंगल पांडेय ने ईस्ट इंडिया के "34 नंबर देसी पैदल सेना की 19वीं रेजीमेंट की पांचवी कंपनी के 1446 नंबर के सिपाही होते हुए भी अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचार के खिलाफ बैरकपुर छावनी में बगावत कर न सिर्फ हथियार उठाया बल्कि कई अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार कर सोए भारत के स्वाभिमान को जगा दिया। 8 अप्रैल 1857 को अंग्रेजों ने बैरकपुर छावनी के परेड ग्राउंड में ही मंगल पांडेय को फांसी के फंदे पर झूला दिया। मंगल पांडेय की इस बगावत ने पूरे भारत में अंग्रेजों के जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करने की ताकत दी। बैरकपुर छावनी से उठी क्रांति की चिंगारी सुलगते-सुलगते 1942 में शोला बनकर धधक उठी। जिसका नतीजा रहा कि मेरठ और दिल्ली में भड़का विद्रोह 15 अगस्त 1947 को देश आजाद कराकर ही शांत हुआ।

    आजादी के इस संघर्ष के अनगिनत नायकों में मंगल पांडेय, लक्ष्मीबाई, गोखले, तात्याॅं टोपे, कुंवर सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, खुदीराम बोस, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, चित्तू पांडेय, जयप्रकाश नारायण, अब्दुल कलाम आजाद इत्यादि का विशेष योगदान था। सदियों की परतंत्रता के बाद 15, अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उस दिन लालकिले के प्राचीर पर तिरंगा फहराया था, तब से हर वर्ष लालकिले पर इस दिन प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है। झंडे को इक्कीस तोपों की सलामी दी जाती है एवं रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्वतंत्रता दिवस हमें देश के लिए शहीद हुए लोगों की याद दिलाता है। साथही हमें किसी भी कीमत पर स्वतंत्रता की रक्षा करने की प्रेरणा देता है। राष्ट्रीय एकता ही सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला होती है। इसलिए देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।


    🙏शहीदों को शत-शत नमन! एवं आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं..

    🙏बब्बन विद्यार्थी प्रवक्ता- मंगल पांडेय विचार सेवा समिति बलिया

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