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    मातृ-पितृ पूजन दिवस की आवश्यकता व उद्देश्य एक यह महापर्व है: संतोष कुमार गुप्ता





    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 

    🔹मातृ-पितृ पूजन दिवस की आवश्यकता व उद्देश्य🔹

    बलिया उत्तरप्रदेश:---१४ फरवरी को 'मातृ-पितृ पूजन दिवस' महापर्व है। इस लोक-मांगल्यकारी, विश्वव्यापी, सभी धर्मों के लोगों द्वारा मनाये जानेवाले पर्व के प्रणेता व मार्गदर्शक हैं ब्रह्मवेत्ता संत पूज्य बापूजी। इस पर्व को सर्जित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी तथा इसको मनाने से क्या लाभ होते हैं यह जानते हैं पूज्यश्री के ही श्रीमुख से :

    🔸प्रेमी-प्रेमिका 'आई लव यू, आई लव यू...' करके काम-विकार में गिरते हैं, थोड़ी देर के बाद अभागे ठुस्स हो जाते हैं। मैंने इससे लाखों- लाखों बच्चों की जिंदगी तबाह होते हुए सुनी है।
    🔸२८ विकसित देशों में 'आई लव यू व वेलेंटाइन डे' के चक्कर में हर वर्ष १३ से १९ साल की १२ लाख ५० हजार कन्याएँ स्कूल जाते-जाते गर्भवती हो जाती हैं। जिनमें से ५ लाख कन्याएँ तो चुपचाप गर्भपात करा लेती हैं और जो नहीं करा पाती हैं ऐसी ७ लाख ५० हजार कन्याएँ कुँवारी माँ बनकर नर्सिंग होम, सरकार व माँ बाप के लिए बोझा बन जाती हैं अथवा वेश्यावृत्ति धारण कर लेती हैं।
    🔸अमेरिका और अन्य विकसित देशों के करोड़ों रुपये वेलेंटाइन डे में तबाह हुए ऐसे छोरे-छोरियों की जिंदगी बचाने में खर्च होते हैं। ऐसा काहे को करना !

    🔹लेकिन विदेशियों ने फैशन चला दिया: 'आई लव यू, आई लव यू...' बड़ी बेशर्माई है। बच्चे माँ-बाप को पूछें ही नहीं, लोफर-लोफरियाँ बन जायें। वे खुद बरबाद हो जायें तो माँ-बाप की क्या सेवा करेंगे ?

    🔸इसमें सबका भला है🔸

    🔸कुछ मनुष्य तो अक्लवाले होते हैं और कुछ अक्ल खो के प्रेमिकाओं के पीछे, प्रेमियों के दिवस : १४ फरवरी पीछे तबाह होते हैं, उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। सुंदरी सुंदरे जितने कामी होते हैं उतनी ही उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। ऐसे कामी सँभल जायें तो अच्छा है, नहीं तो फिर ऐसे लोग मरने के बाद पतंगे होते हैं। पतंगे दीये में जलते हैं। एक जल रहा है यह दूसरों को दिख रहा है फिर भी दे धड़ाधड़... और जल मरते हैं।
    🔸वेलेंटाइन डे' वाले तो अपनी ईसाइयत का प्रचार करते हैं परंतु लोगों की जिंदगी तबाह होती है। फिर मैं भगवान का ध्यान करके भगवान में डूब गया, एकाकार हो गया और उपाय खोजा। उपाय मिल गया - गणपति और कार्तिकेय स्वामी की चर्चा का प्रसंग। उसे मैंने अच्छी तरह समझ लिया। मैंने सत्संग में बोला कि 'माँ की प्रदक्षिणा करने से सारे तीर्थों का फल होता है और पिता का आदर व प्रदक्षिणा करने से सब देवों की पूजा का फल मिलता है।

    सर्वतीर्थमयी माता, सर्वदेवमयः पिता ।

    🔸इसका प्रचार करेंगे तो बच्चे-बच्चियों का, माँ-बाप का सबका भला हो जायेगा।' मैं भी आशाओं का राम हूँ, आशाओं का गुलाम नहीं हूँ। मैं जब चाहूँ मेरा प्यारा मेरे लिए ज्ञान के दरवाजे खोल देता है।
    🔸मैंने इस विषय पर सत्संग चालू किये फिर घोषणा कर दी: 'वेलेंटाइन डे के बदले मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाओ।'
    🔸फिर मैंने यह भी बता दिया कि 'हम ईसाई, मुसलमान, हिन्दू, सिख तथा और भी जो जाति-धर्म-पंथ हैं सभीका भला चाहते हैं । हम किसीका बुरा नहीं चाहते हैं । बच्चे-बच्चियाँ तबाह न हों इसलिए १४ फरवरी को वेलेंटाइन डे के बदले मातृ-पितृ पूजन दिवस चालू किया है।' अब तो यह विश्वव्यापी हो गया है।

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