उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: समाचार डेस्क
बलिया:---सत्य राह पर चलते-चलते मर जाएंगे पर झुकेंगे नहीं। जनपद के इसी तेवर ने बलिया को बागी बना दिया। अंग्रेजों भारत छोड़ो की बलिया इक अमिट निशानी है। जर्जर तन बूढ़े भारत की यह मस्ती भरी जवानी है। चित्तू पांडेय के प्रपौत्र जैनेंद्र पांडेय ने कहा कि जंग-ए-आजादी के दीवानों का हुजूम, हिंदुस्तान जिंदाबाद और भारत माता की जय जैसे नारों से गूंजती फिजाएं और चहुं ओर देशभक्ति की बयार। बलिया के अगस्त क्रांति को भुलाया नहीं जा सकता है।
19 अगस्त 1942 को जेल का फाटक खोला गया और स्वतंत्रता आंदोलन के दीवाने आजाद हुए। इसी के साथ जिले ने न सिर्फ बागी बलिया का तमगा हासिल किया। बल्कि देश में सबसे पहले आजाद होने का गौरव भी हासिल कर लिया। इतिहासकार शिवकुमार कोशिकेय बताते हैं कि 19 अगस्त को जिले की जनता ने 13 थानों में से 10 थानों पर अधिकार कर लिया था। जिले पर कब्जा करने के लिए 1 लाख से अधिक सशस्त्र जनता ने जिला मुख्यालय को घेर लिया।
चित्तू पांडेय को मिली ‘शेरे -ए -बलिया’ की उपाधि
चित्तू पांडेय का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रत्तू-चक गांव में 1865 में हुआ था। चित्तू पांडेय को जवाहर लाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस ने ‘शेर-ए-बलिया’ की उपाधि दी थी। उनका निधन 1946 में हों गया था।
जनता के आक्रोश देख फूल गए थे हाथ पांव
यह वही समय था जब महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। लाखों लोग अब कुछ करने या फिर मरने पर आमादा थे। उस समय तत्कालीन डीएम जे. निगम थे और एसपी रियाजुद्दीन अहमद खान थे। एसपी डीएम के पास कोई रास्ता नहीं था। कारणवश उनके हाथ पांव फूलने लगे। कलेक्टर को जन दबाव के कारण जेल में बंद चित्तू पांडेय और उनके साथियों को रिहा करना पड़ा। जेल से निकलने में थोड़ी देर हुई तो लोगों ने फाटक ही तोड़ दिया। इसके बाद आंदोलनकारियों ने खुद कलेक्टरी पर कब्जा कर लिया और चित्तू पांडेय को वहां का जिलाधिकारी घोषित कर दिया।

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