उत्तर प्रदेश अयोध्या
इनपुट: संतोष मिश्रा
अयोध्या:---कल की कहानी को,मीटती निशानी को,
बहते से पानी को, बिखरी जवानी को,
एक मोड़ दो, या कहीं छोड़ दो।।
उड़ती रवानी को,रंगो की धानी को,
कल के पेशानी को,बदली सी बानी को,
कहीं छोड़ दो, या कुछ और दो।।
महलों की रानी को,बूढ़ी सी नानी को,
खालिश जुबानी को, इस कारस्तानी को,
कुछ और दो,या लगे तोड़ दो।।
आशक्त राहों को,तरसी निगाहों को,
मिले जो पनाहों को,गोरी की बाहों को,
लगे तोड़ दो, या नया दौर दो।।
बड़े बादशाहों को,यहाँ धूप छावों को,
अंजानी राहों को,बरसते घाटाओ को,
नया दौर दो,या चलो जोड़ दो।।
जीते की बातों को,अँधेरी रातों को,
मिलते जो घातों को, सोते जज्बातों को,
चलो जोड़ दो, या यहीं छोड़ दो।।
एक मोड़ दो, या कहीं छोड़ दो।।
जितेन्द्र राय "मुक्तकंठ "पुणे

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