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    बचाओ! बचाओ! जीवक ने फांसी लगा ली?

    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: अमीत कुमार गुप्ता 




    बलिया उत्तरप्रदेश:--बचाओ! बचाओ! जीवक ने फांसी लगा ली। मेरे बेटे को कोई तो बचा लो। दरवाजा खोलो। सागरी देवी जोर जोर से चिल्ला चिल्लाकर पड़ोस के लोगों को बुला रही थीं। 

    आस पड़ोस के सब लोग उनकी आवाज सुनकर उनके घर की ओर दौड़ पड़े। वैसे भी इस तरह की बात सुनकर कोई राह चलता हो वह भी आ जाता फिर ये तो पड़ोसी थे। सागरी देवी के घर बहुत भीड़ लग गयी। सब अपने अपने विचार दे रहे थे। कोई कह रहा था अब तो ये नहीं बचेगा , कोई कह रहा था ऐसे मत जाओ ये पुलिस का मामला है, कोई कह रहा था पुलिस को फोन करो तो कोई एम्बुलेंस को फोन करने को कह रहा था। 

    सागरी देवी जोर जोर से रो रही थीं और चिल्ला चिल्लाकर अपनी बहू को गंदे गंदे शब्दों से अपमानित कर रही थीं। वह बेचारी बेसुध सी अपने कमरे के दरवाजे के पास अपने दो साल के बच्चे को लिए लिए बैठी थी। 

    सागरी देवी के बेटे की शादी अंगिका के साथ तीन साल पहले ही हुई थी। उनका एक दो साल का बच्चा है।

     

    तब तक उधर से पड़ोस में रहने वाले नौजवान निमिष ने सागरी देवी से कहा, "ताई जी जीवक भैया को बचाना है तो हमें दरवाजा तोड़ना पड़ेगा।"

    सागरी देवी ने निमिष से कहा, "तोड़ दे दरवाजा मेरे बेटे से कीमती नहीं है।" और फिर उस दरवाजे के टूटने और उसके नुकसान का सारा दोष अपनी बहू को देती हुई उसे गालियाँ देने लगीं। 

    कई लड़कों ने मिलकर दरवाजा तोड़ा और दौड़कर पंखे से लटके जीवक के पैर को अपने कंधे पर रख लिया फिर उसे नीचे उतारा। इतने में पुलिस और एंबुलेंस दोनों आ गई। पुलिस वालों को देखते ही सागरी देवी और जोर से रोने लगीं और बहू को बुरा भला कहने लगीं। वो ऐसा पुलिस को दिखाने के लिए कर रही थीं ताकि पुलिस को लगे उनकी बहू ने उनके बेटे को ऐसा करने के लिए मजबूर किया है। 

    पुलिस वालों ने सबकुछ नजरंदाज करते हुए लोगों से कहा, "आप सब पीछे हटिए यहाँ से। बाहर जाइए यहाँ भीड़ मत लगाइए।" फिर जीवक को चेक करते हैं। "अरे ये तो जिंदा है, तुरंत अपने सिपाहियों को आदेश दिया इसे जल्दी से एंबुलेंस में रखकर अस्पताल ले चलो।" सिपाही सबको हटाते हुए उसे एंबुलेंस में लेकर तुरंत अस्पताल चले गए। 

    पुलिस ने कहा, "अब आप सब अपने अपने घर जाइए"। इतना सुनते ही सब जाने लगे। 

    पुलिस ने सागरी देवी से कहा, "पति कहाँ हैं आपके?"  

    सागरी देवी ने हाथों से संकेत करके कहा, "वे उधर चारपाई पर लेटे हैं, उनकी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए वह दवा खाकर सो रहे हैं। वह चल फिर नहीं सकते हैं। "

    पुलिस ने कहा, "और कौन-कौन है आपके घर में?"

    सागरी देवी ने कहा, "मैं, मेरे पति, मेरा बेटा बहू और एक दो साल का पोता, इतने लोग ही घर में रहते हैं।" 

    फिर पुलिस ने पूछा, "आपके कितने बच्चे हैं?" 

    सागरी देवी ने कहा, "मेरे दो बेटी एक बेटा है, दोनों बेटियों की शादी हो गई दोनों अपने-अपने ससुराल में हैं, फोन कर दिया है अभी आती होंगी।" 

    पुलिस ने कहा, "अच्छा ठीक है आप और आपकी बहू अभी मेरे साथ चलो अस्पताल।" 

    सागरी देवी  ने कहा, "ये कुलक्षिणी मेरे साथ अस्पताल नहीं जायेगी। इसी ने मेरे बेटे को मारा है।" 

    पुलिस ने सागरी देवी को डांटते हुए कहा, "चुप एकदम चुप ऐसे समय में भी तुमको लड़ाई झगड़ा समझ में आता है। देख नहीं रही हो, उसकी क्या हालत है। तुम्हारा तो बेटा है लेकिन उसके लिए तो पूरा जीवन है वो, उसके बच्चे का पिता है।" उनकी बात सागरी देवी को अच्छी तो नहीं लगी लेकिन वह उनके सामने कुछ बोल ना सकीं और चुप रहीं। फिर पुलिस सागरी देवी को और उसकी बहू को लेकर अस्पताल पहुंचते हैं। 

    वहां जीवक का इलाज डॉक्टरों ने शुरू कर दिया था। ऑक्सीजन लगा था उसको। वेंटिलेटर पर बहुत सारी मशीनें लगी थीं।बहू को तो जैसे कुछ होश ही न हो। वह तो निष्प्राण सी हो गयी थी।  सागरी देवी वहाँ भी रोती जा रही थीं और बहू को कुछ न कुछ कहती जा रही थीं। 

    पुलिस वालों ने कागजी कार्रवाई की और उस पर साइन करने को कहा। सागरी देवी के पढ़ी लिखी नहीं होने के कारण उन्होंने अंगूठा लगाए । बहू ने जैसे ही साइन किया तब तक उनके बेटी और दामाद भी वहां पहुंच गए फिर सागरी देवी जोर-जोर से रोते हुए अपने बेटी और दामाद से सारी घटना बताने लगीं।  

    पुलिस वालों ने डॉक्टर से कहा, इसको होश आने पर सबसे पहले हमें सूचना दीजिएगा। यह कहकर पुलिस वाले तो जा चुके थे पर एक दो सिपाही वहीं रह गए थे। 

    सब वहीं बैठे हुए थे, डॉक्टर अपना काम कर रहे थे। धीरे-धीरे सुबह से शाम हो गई लेकिन जीवक को होश नहीं आया। बेटी और दामाद ने माँ को समझा बुझाकर कैंटीन में कुछ खिला दिया पर बहू की तरफ किसी ने देखा भी नहीं।उसने सुबह से शाम हो

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