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    श्रीहनुमान चरित २१:|| माता सीता से बिदाई ||



    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 

    बलिया उत्तरप्रदेश:---जय श्रीसीताराम !'— हर्षातिरेकसे हनुमानजीके मुँहसे जयध्वनि हो रही थी। वे अत्यन्त तीव्रगतिसे दौड़े जगज्जननी जानकीकी ओर ! हनुमानजीकी कुशलताकी चिन्तामें माता उदास बैठी थीं; श्रीपवनपुत्रने दौड़कर 'माँ-माँ' कहते हुए उनके चरण-कमलोंपर सिर रख दिया। माँके हृदयमें वात्सल्य उमड़ पड़ा और नेत्र सजल हो गये। उन्होंने परम भाग्यवान् हनुमानजीके मस्तकपर अपना अभयद कर-कमल रख दिया। अतिशय स्नेहसे माता जानकीने पूछा— 'बेटा ! तुझे सकुशल देखकर मेरा मन हलका हो गया। तेरा कोई अङ्ग जला तो नहीं ?'

                श्रीपवननन्दन तो माताका सहज स्नेह पाकर पुलकित हो गये थे। उन्होंने कहा— 'माँ ! जब आपका परम पावन अभयद कर-कमल मेरे मस्तकपर है, तब त्रिभुवनमें मेरा बाल भी बाँका कैसे हो सकता है ? आपकी दयासे मेरे यहाँ आनेके उद्देश्यकी पूर्ति हो गयी। मैंने आपके चरणोंका दर्शन प्राप्त कर लिया, लंकाके रहस्य एवं राक्षसोंकी शक्तिसे मैं परिचित हो गया; साथ ही यहाँके प्रत्येक स्थलको भी मैंने अच्छी प्रकार देख लिया। अब आप कृपापूर्वक मुझे आज्ञा प्रदान करें, जिससे मैं प्रभुके चरणोंमें पहुँचकर आपका संदेश उन्हें सुना दूँ और सर्वसमर्थ करुणानिधान यथाशीघ्र लंकामें प्रवेश करके इन क्रूरतम असुरोंका संहार करें।'

                माता वैदेहीके नेत्र बरस पड़े। उन्होंने अत्यन्त व्यथासे कहा— 'बेटा ! तुम्हारे यहाँ आनेसे मुझे सहारा मिल गया था। अब तुम भी जा रहे हो ! तुम्हारे चले जानेके बाद मेरे लिये फिर वही दुःखके दिन और दुःखकी रात्रियाँ होंगी। पर यदि तुम थक गये हो तो एक दिन यहाँ किसी गुप्त स्थानमें ठहर जाओ। आज विश्राम करके कल चले जाना।'

                अत्यन्त श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक पवनकुमारने निवेदन किया— 'माँ ! प्रभुका कार्य सम्पन्न हुए बिना मुझे विश्राम कहाँ ! आपका अमोघ आशीर्वाद मेरे साथ है। मैं जिस वेगसे यहाँ आया था, उसी वेगसे समुद्र पार कर जाऊँगा। वहाँ कोटि-कोटि वानर-भालू मेरी प्रतीक्षा करते होंगे। आपका समाचार पाकर उन सबके प्राण लौट आयँगे। फिर तो वानरी सेनाके साथ प्रभु यहाँ आयेंगे ही। आप दोनोंको दिव्य सिंहासनपर एक साथ विराजमान देखकर ही हमलोग सुखी होंगे।'

                भगवती सीताने स्नेहपूर्वक पूछा— 'बेटा ! मेरे मनमें एक संदेह अभीतक बना हुआ है। मैं समझती हूँ, तीन ही प्राणियोंमें समुद्रको लाँघनेकी शक्ति है— तुममें, गरुडमें और पवनदेवतामें। फिर बड़े-बड़े वानरों और रीछोंके सहायक होनेपर भी महाबली सुग्रीव इस दुर्लङ्घय समुद्रको कैसे पार करेंगे ? उनकी विशाल वाहिनीसहित सानुज प्रभु सागर कैसे लाँघ सकेंगे ?'

                हनुमानजीने विनयपूर्वक उत्तर दिया— 'माता ! बंदरोंकी शक्ति ही कितनी है ! वे इस डालसे कूदकर उस डालपर चले जायँगे, बस ! किंतु परमप्रभु श्रीरामकी अपरिसीम शक्तिसे सब सम्भव है। उनकी कृपाकी कोरसे अत्यन्त छोटा सर्प भी महाबली गरुडको खा सकता है; सर्वथा पङ्गु गगनस्पर्शी गिरिवरको लाँघनेमें समर्थ हो सकता है। उन मन-बुद्धिसे परे अचिन्त्य प्रभुके दर्शन कर समुद्र स्वयं मार्ग दे देगा। यदि उसने मार्ग देनेमें आनाकानी की तो उसे शुष्क कर देनेके लिये सुमित्राकुमारका एक ही शर पर्याप्त है। दूसरे, वानरराज सुग्रीव सहस्त्रों कोटि वानरोंसे घिरे हैं। उन शक्तिशाली कपिराजने आपके उद्धारकी प्रतिज्ञा कर ली है। उनके पास साधनोंका अभाव नहीं है। आप धैर्य रखें। अब मेरे स्वामी यहाँ यथाशीघ्र पहुँचकर आपका उद्धार करेंगे।'

                 श्रीअञ्जनानन्दवर्धनके उत्तरसे माताको संतोष हुआ। उन्होंने अवरुद्ध कण्ठसे हनुमानजीसे कहा— 'बेटा ! प्रभुके चरणोंमें मेरा प्रणाम निवेदन कर उन्हें मेरी दयनीय स्थिति बता देना और उनसे मेरी ओरसे बद्धाञ्जलि प्रार्थना करना कि वे तुरंत आयें। मैं प्रतिक्षण उन्हींकी प्रतीक्षा करती हुई जी रही हूँ; अवधि समाप्त होनेपर मेरे प्राण नहीं टिक सकेंगे।'

                दुःखिनी माताके नेत्रोंसे आँसू बहते जा रहे थे। उन्हें पोंछ-पोंछकर वे धैर्यपूर्वक अपने प्राणनाथके लिये संदेश दे रही थीं— "बेटा ! मेरे प्रिय देवर लखनलालसे कहना कि मुझसे अपराध हो गया; वे मुझे क्षमा कर दें। मेरा आशीर्वाद उन्हें देना। वानरराज सुग्रीव, जाम्बवान्, युवराज अङ्गद आदि सबको मेरा आशीर्वाद देना। उन सबसे कहना कि 'मैं आपलोगोंके साथ प्रभुके आगमनकी प्रतीक्षामें एक-एक पल बिता रही हूँ।" इतना कहकर कमल-लोचना माता सीताने अञ्चलसे मुँह ढक लिया।

               माताकी यह विवश अवस्था देखकर महावीर श्रीहनुमानका धैर्य जाता रहा। वे भी फफककर रो पड़े। बड़ी कठिनाईसे वे बोल सके— 'माँ ! आप धैर्य धारण कीजिये; मेरे पहुँचते ही प्रभु यहाँके लिये प्रस्थित हो जायँगे।'

                 कुछ रुककर धैर्यपूर्वक हनुमानजीने कहा— 'माता ! प्रभुने जैसे आपके लिये अपनी मुद्रिका भेजी थी, उसी प्रकार आप भी मुझे अपना कोई चिह्न दे दें, जिसे मैं प्रभुको दिखा सकूँ।'

                माता सीताने अपने केश-पाशसे चूड़ामणिको निकाला और उसे पवनकुमारको देते हुए कहा— "बेटा ! इससे श्रीआर्यपुत्र और लक्ष्मण तुम्हारा विश्वास कर सकेंगे। उनके विश्वासके लिये मैं तुम्हें एक बात और बतला देती हूँ। तुम मेरे प्राणधनसे निवेदन कर देना—'चित्रकूटपर्वतकी बात है। एक दिन मेरे जीवन-सर्वस्व एकान्तमें मेरी गोदमें सिर रखे सो रहे थे। उसी समय इन्द्र-पुत्र ( जयन्त ) काकवेषमें वहाँ आया और मांसके लोभसे उसने मेरे पैरके लाल-लाल अँगूठेको अपनी तीखी चोंच तथा पंजोंसे फाड़ डाला। निद्रासे उठते ही स्वामीने मेरे पैरका अँगूठा देखा तो व्याकुल होकर उन्होंने पूछा— 'प्रिये ! यह किस दुष्टकी करनी है ?' और उसी समय उन्होंने सामने रक्तसे सनी चोंचवाले काकको बार-बार मेरी ओर आते देखा। फिर क्या था ? क्रुद्ध प्रभुने एक तृण उठाया और उसपर दिव्यास्त्रका प्रयोग करके उस प्रज्वलित अस्त्रको लीलासे ही उस कौएकी ओर फेंक दिया। * भयभीत काक प्राण लेकर भागा। वह तीव्रतम गतिसे भागता हुआ जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ वह प्रज्वलित अस्त्र उसके पीछे लगा दीख पड़ता था। जयन्त इन्द्र और ब्रह्मादिके समीप गया, किंतु रामास्त्रके सम्मुख उसे किसीने आश्रय नहीं दिया। विवश होकर 'प्रभो ! क्षमा करें । प्रभो ! अपराध क्षमा हो'— कहता हुआ वह प्रभुके चरणोंमें गिर पड़ा। दयानिधान प्रभुने उससे कहा— 'यह मेरा अस्त्र अमोघ है। अतएव तू अपनी एक आँख देकर चला जा।' उस काकने अपनी बायीं आँख दे दी और प्रभुसे बार-बार क्षमा-याचना करता हुआ वह चला गया। बेटा ! उन अपरिसीम-अचिन्त्यशक्ति-सम्पन्न प्रभुसे कहना— 'वे शीघ्र पधारें'।"

    पवननन्दनने माताके चरणोंपर सिर रख दिया और कहा— 'माँ ! अब मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये।'

    माताके नेत्र पुनः बरस पड़े। आँसू पोंछते हुए उन्होंने कहा— 'बेटा हनुमान ! जाओ, पर प्रभुके साथ शीघ्र लौटना। देर न करना। तुम्हारा सर्वविध मङ्गल हो!'

      हनुमानजीने सृष्टि-स्थिति-संहारकारिणी जननीका आशीर्वाद प्राप्तकर मन-ही-मन श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रणाम किया और फिर उछलकर उत्तम अरिष्ट-गिरिपर चढ़ गये। उस शैलराजपर आरूढ हो वायुनन्दन कपिश्रेष्ठ श्रीहनुमानने अपना शरीर बहुत विशाल बना लिया। वे दक्षिणसे उत्तर दिशामें सागर पार करनेके लिये बड़े वेगसे उछले । हनुमानजीके पैरोंका दबाव पड़नेके कारण तीस योजन ऊँचा और दस योजन चौड़ा वह शोभाशाली महीधर वृक्षों और ऊँचे शिखरोंसहित तत्काल धरतीमें धँस गया।

                अरिष्ट-गिरिसे उछलकर आकाशमें पहुँचते ही महाबली वज्राङ्ग श्रीहनुमानने भयानक गर्जना की, जिससे दिशाएँ थर्रा उठीं, आकाश जैसे फट गया, मेघ तितर-बितर हो गये, समुद्र उछलने लगा, गिरि-शृङ्ग टूट-टूटकर गिरने लगे और समूची लंका हिल उठी। असुरोंने समझा कि भूकम्प आया है। वीर राक्षस जहाँ थे, वहीं काँपकर गिर पड़े। गर्भवती राक्षसियोंका गर्भपात हो गया। सभासदोंसहित स्वयं दशग्रीव भी सिंहासनसे नीचे लुढ़क पड़ा। उसके बहुमूल्य मुकुट सिरसे खिसककर नीचे गिर गये। इस अपशकुनकी असुरोंमें सर्वत्र चर्चा होने लगी। सबमें भय और आतङ्क व्याप्त हो गया।

     समुद्रके मध्यमें पर्वतराज सुनाभ ( मैनाक )-को स्पर्श कर अत्यन्त वेगशाली पवनकुमार धनुषसे छूटे हुए वाण-तुल्य सागरके उत्तरी तटके समीप पहुँचे। महेन्द्रपर्वतपर दृष्टि पड़ते ही उन्होंने गम्भीर स्वरमें बार-बार गर्जना की।

    🕉️ व्रत पर्व एवं त्योहार 🕉️

    👉  फलम् - फलम् - यह पक्ष १६ दिन का है क्योंकि चतुर्थी तिथि की वृद्धि हो गई है। नवरात्र में तिथि की वृद्धि शुभफल कारक होती है। चित्रा नक्षत्र कन्या राशि का चन्द्रदर्शन मु.३० बाजार भाव को स्थिर रखेगा।

    🎊🏵️🎊▪️ आश्विन शुक्ल पक्ष आदि शक्ति भगवती दुर्गा एवं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम के द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करने के वर्णन को दर्शाने एवं उनकी पूजा आराधना का पर्व है।

    🎊🏵️🎊▪️ शारदीय नवरात्र  में माता भगवती की पूजा अनुष्ठान करने से सम्बन्धित कलश स्थापन २२ सितम्बर सोमवार को सुबह से सायं कालतक किसी भी समय किया जा सकता है।

    🎊🏵️🎊▪️नवरात्र में दुर्गा सप्तसती का पाठ स्वयं करना  अथवा ब्राह्मण पुरोहित द्वारा संकल्प लेकर कराना परम पुण्यफलकारी होता है। घर परिवार में सुख शान्ति बनी रहती है।

    🎊🏵️🎊▪️रावण पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से भगवान राम द्वारा की गई त्रिदिवसीय शक्ति पूजा पर आधारित सप्तमी तिथि में पूजा पण्डालों में देवी प्रतिमाओं की स्थापना मूल नक्षत्र से युक्त सप्तमी तिथि में २९ सितम्बर सोमवार दिन में १२।२६ बजे के पूर्व ही कर लेनी चाहिए।

    🎊🏵️🎊▪️इस बार देवी का आगमन हाथी पर होगा जिसका फल वृष्टि कारक होता है।

    🎊🏵️🎊▪️महानिशा अष्टमी तिथि में पूजा करने वाले श्रद्धालु २९ सितम्बर को अपनी परम्परा के अनुसार पूजनादि कार्य करेंगे।

    🎊🏵️🎊▪️महाष्टमी  व्रत ३० सितम्बर मंगलवार को किया जायेगा। पूजा पण्डालों में की जाने वाली सन्धि पूजा ३० सित. को मध्याह्न १।२१ बजे से लेकर २।९ बजे तक की जायेगी।

    🎊🏵️🎊▪️ महानवमी का मान १ अक्टूबर बुधवार को होगा एवं आज ही नवमी तिथि पर्यन्त दिन में २।३५ बजे तक पूर्ण नवरात्र के पूजन-अनुष्ठान की समाप्ति का हवन कर लिया जायेगा। इसके उपरान्त दशमी तिथि में पूर्ण नवरात्र व्रत का पारण भी आज ही कर लिया जायेगा ।

    🎊🏵️🎊▪️विजया दशमी का परम पवित्र पर्व २ अक्टूबर गुरुवार को श्रवण नक्षत्र युक्त उदयकालिक एवं अपराह्मण व्यापिनी दशमी तिथि में माना जायेगा। सरस्वती विसर्जन के साथ दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन किया जायेगा।

    🎊🏵️🎊▪️पापांकुशा एकादशी व्रत का मान सबके लिये अक्टूबर शुक्रवार को होगा। आज काशी में नाटी इमली की विश्वप्रसिद्ध भरत मिलाप की रामलीला काशीराज की गौरवपूर्ण उपस्थित एवं काशी के यादव बन्धुओं की परम्परागत सहभागिता के साथ भावपूर्ण वातावरण में सम्पन्न होगी। अस्ताचलगामी सूर्य की सुनहरी किरणों से आलोकित चारों भाइ‌यों के भाावपूर्ण मिलन के नयनाभिराम दृश्य को देखकर काशीवासी निहाल हो जायेंगे।

    🎊🏵️🎊▪️पुत्र की कामना से शनिप्रदोष का व्रत ४ अक्टूबर को किया जायेगा।

    🎊🏵️🎊▪️व्रत के लिये पूर्णिमा एवं शरद पूर्णिमा तथा कोजागरी पूर्णिमा ६ अक्टूबर सोमवार को ही रात्रि व्यापिनी पूर्णिमा मिलने के कारण हो जायेगी।

    🎊🏵️🎊▪️आज की रात शर्करायुक्त शुद्ध दूध से निर्मित खीर को पूर्ण - चन्द्रमा की अमृतोमय चाँदनी में रख दिया जाता हैं एवं पूर्ण चन्द्र की चाँदनी की अमृत वर्षा से सिक्त खीर को प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। माना जाता है कि इसमें अनेक रोगों के शमन की शक्ति होती है।

    🎊🏵️🎊▪️स्नान-दान की पूर्णिमा एवं बाल्मीकि जयन्ती ७ अक्टूबर मंगलवार को मनायी जायेगी। 

    🎊🏵️🎊▪️स्नान-दान एवं श्राद्ध सहित सर्वपैतृ अमावस्या पितृ विसर्जन महालया २१ सितम्बर रविवार को होगा। ब्राह्मणों को चतुर्भुज श्री महाविष्णु का स्वरूप मानते हुए उनको भोजन कराना एवं श्रद्धा पूर्वक दान-दक्षिणा देकर उनको संतुष्ट करना परिवार में सुख-शान्ति प्रदान करता है तथा वंशवृद्धि होती है। हर सनातन धर्मी को इस पुनीत कार्य को अवश्य ही करना चाहिये। 

    👉  हस्त नक्षत्र का सूर्य २७ सितम्बर शनिवार को रात १०।१४ बजे से आयेगा। इसमें हल्की वर्षा की सम्भावना है।

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