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    आज 10 अक्टूबर शुक्रवार को करवा चौथ की कथा जानिएं : पंडित आशिष तिवारी




    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 

    बलिया उत्तरप्रदेश:--करवा चौथ चतुर्थी हिन्दू पंचांग अनुसार कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन यह व्रत किया जाता है।

    इस व्रत की विशेषता यह है कि केवल सौभाग्यवती स्त्रियों को ही यह व्रत करने का अधिकार है। इस व्रत में अपने वैवाहिक जीवन को समृद्ध बनाए रखने के लिए सौभाग्यवती सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य की कामना करती हैं, वे यह व्रत रखती हैं। स्त्री किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो, सबको इस व्रत को करने का अधिकार है ...

    सभी विवाहित स्त्रियाँ इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। चूंकि शिव-पार्वती का पति-पत्नी के युगल रूप में धार्मिक महत्त्व है इसलिए इनके पूजन से सभी स्त्रियाँ पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। 

    करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा करने का बहुत ही खास महत्व है। चंद्रमा को शीतलता और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है और इससे मिली मानसिक शांति से रिश्ते मजबूत होते हैं। यह भी देखा गया है कि अधिकतर लोग जो मोक्ष को प्राप्त हुए हैं वह भी चंद्रमा वाले दिन यानी पूर्णिमा वाले दिन ही प्राप्त हुए है। जैसे समुद्र को चंद्रमा रेगुलेट करता है वैसे ही हमारे मन को भी चंद्रमा रेगुलेट करता है। चंद्रमा को लंबी आयु का वरदान मिला है. चांद के पास  प्रेम और प्रसिद्धि है। यही वजह है कि सुहागिनें चंद्रमा की पूजा करती है। जिससे ये सारे गुण उनके पति में भी आ जाएंl

    यह व्रत 12 वर्ष तक अथवा 16 वर्ष तक लगातार हर वर्ष किया जाता है। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन (उपसंहार) किया जाता है। जो सुहागिन स्त्रियाँ आजीवन रखना चाहें वे जीवनभर इस व्रत को कर सकती हैं। इस व्रत के समान सौभाग्यदायक व्रत अन्य कोई दूसरा नहीं है। अतः सुहागिन स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षार्थ इस व्रत का सतत पालन करें।

    पूजन विधि, नियम एवं व्रत विधि
    घर के दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा चित्र बनाएं इसे वर कहा जाता है चित्र बनाने की कला को करवा धरना कहा जाता है।

    आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ और पक्के पकवान बनाएं।

    पीली मिट्टी से गौरी बनाएं साथ ही गणेश को बनाकर गौरी के गोद में बिठाएं।

    गौरी को लकड़ी के आसन पर बिठाएं। चौक बनाकर आसन को उस पर रखें। गौरी को चुनरी ओढ़ाएं। बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें।
    जल से भरा हुआ लोटा रखें।

    भेंट देने के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें। करवा में गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें। रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं। गौरी-गणेश और चित्रित करवा की परंपरानुसार पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करें।

    'नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥'

    करवा पर 13 बिंदी रखें और गेहूं या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें।


    कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें।
    तेरह दाने गेहूं के और पानी का लोटा या टोंटीदार करवा अलग रख लें। रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें।

    इसके बाद पति से आशीर्वाद लें। दिन भर निर्जला रहकर, व्रत खोलने के लिए सुहागनों को पूरा बताशा खाना चाहिए, आधा या टूटा बताशा नहीं, क्योंकि वह पूर्ण है और चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है और रिश्ते को भी पूर्ण बनाता है।
    बताशा आधा खाकर एक-दूसरे को ना खिलाएं, बल्कि पूरा साबुत बताशा खाएं। ताकि आपके अंदर पूर्णता आए, क्योंकि जब हम अंदर से पूर्ण होते हैं तभी दूसरे को प्यार दे पाते हैं।

    इसके बाद पति को भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें।

    सुहागिनों को इस दिन खास तौर पर ध्यान रखना चाहिए कि सुहाग सामग्री यानि चूड़ी, लहठी, ब‌िंदी, स‌िंदूर को कचड़े में बिल्कुल ना फेंके. इतना ही नहीं अगर चूड़ी पहनते वक्त टूट भी जाए तो उसे संभालकर पूजा स्थान पर रख दें। करवा चौथ का व्रत रखने वाली सुहागिनों को इस बात का भी खास ध्यान रखना चाहिए कि आज के दिन स‌िलाई, कटाई, बुनाई के ल‌िए कैंची, सुई, चाकू का इस्तेमाल न करें।

    करवा चौथ की कथा 
    एक समय की बात है, सात भाइयों की एक बहन का विवाह एक राजा से हुआ। विवाहोपरांत जब पहला करवा चौथ आया, तो रानी अपने मायके आ गयी। रीति-रिवाज अनुसार उसने करवा चौथ का व्रत तो रखा किन्तु अधिक समय तक व भूख-प्यास सहन नहीं कर पा रही थी और चाँद दिखने की प्रतीक्षा में बैठी रही। 

    उसका यह हाल उन सातों भाइयों से ना देखा गया, अतः उन्होंने बहन की पीड़ा कम करने हेतु एक पीपल के पेड़ के पीछे एक दर्पण से नकली चाँद की छाया दिखा दी। बहन को लगा कि असली चाँद दिखाई दे गया और उसने अपना व्रत समाप्त कर लिया। इधर रानी ने व्रत समाप्त किया उधर उसके पति का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। 

    यह समाचार सुनते ही वह तुरंत अपने ससुराल को रवाना हो गयी।रास्ते में रानी की भेंट शिव-पार्वती से हुईं। माँ पार्वती ने उसे बताया कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है और इसका कारण वह खुद है। रानी को पहले तो कुछ भी समझ ना आया किन्तु जब उसे पूरी बात का पता चला तो उसने माँ पार्वती से अपने भाइयों की भूल के लिए क्षमा याचना की। 

    यह देख माँ पार्वती ने रानी से कहा कि उसका पति पुनः जीवित हो सकता है यदि वह सम्पूर्ण विधि-विधान से पुनः करवा चौथ का व्रत करें। तत्पश्चात देवी माँ ने रानी को व्रत की पूरी विधि बताई। माँ की बताई विधि का पालन कर रानी ने करवा चौथ का व्रत संपन्न किया और अपने पति की पुनः प्राप्ति की।

    वैसे करवा चौथ की अन्य कई कहानियां भी प्रचलित हैं किन्तु इस कथा का जिक्र शास्त्रों में होने के कारण इसका आज भी महत्त्व बना हुआ है। द्रोपदी द्वारा शुरू किए गए करवा चौथ व्रत की आज भी वही मान्यता है। द्रौपदी ने अपने सुहाग की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखा था और निर्जल रहीं थीं। यह माना जाता है कि पांडवों की विजय में द्रौपदी के इस व्रत का भी महत्व था।

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