उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश:--जब तेरहवीं भी निपट गई, तब पारुल ने अपने भाई नवीन से विदा लेने के लिए नम आँखों से कहा, सब काम हो गए भैया, माँ चली गई अब मैं चलती हूँ। आँसुओं के कारण उसके मुंह से केवल इतना ही निकला।
नवीन ने उसकी बात सुनकर कहा, रुक पारुल अभी एक काम बाकी है। ये ले माँ की अलमारी की चाभी और जो भी सामान चाहिए, ले जा।
पारुल ने चाभी लेने से इनकार करते हुए भाभी मीनू को चाभी पकड़ा दी और कहा, भाभी, ये आपका हक है, आप ही खोलिए। भाभी ने भैया की स्वीकृति पर अलमारी खोली।
भैया बोले, देख ये माँ के कीमती गहने और कपड़े हैं। तुझे जो लेना है, ले जा क्योंकि माँ की चीजों पर पहले बेटी का हक सबसे ज्यादा होता है।
भाभी ने उत्तर दिया, पारुल भैया, मैंने हमेशा यहाँ इन गहनों और कपड़ों से भी कीमती चीज देखी है, मुझे वही चाहिए।
भैया ने पूछा, तू किस कीमती चीज की बात कर रही है, पारुल ? हमने माँ की अलमारी को हाथ तक नहीं लगाया, जो भी है, तेरे सामने है।
पारुल ने कहा, भैया, इन गहनों और कपड़ों आदि पर तो भाभी का हक है क्योंकि उन्होंने माँ की सेवा बहू नहीं, बेटी बनकर की है। मुझे तो वो कीमती सामान चाहिए जो हर बहन और बेटी चाहती है।
भाभी मीनू ने समझते हुए कहा, दीदी, मैं समझ गई कि आपको किस चीज की चाह है। आप फ़िक्र मत कीजिए, माँ के बाद भी आपका ये मायका हमेशा सलामत रहेगा। पर फिर भी माँ की निशानी समझ कुछ तो ले लीजिए।
पारुल ने भाभी को गले लगाते हुए रोते हुए कहा, भाभी, जब मेरा मायका सलामत है मेरे भाई और भाभी के रूप में, तो मुझे किसी निशानी की जरूरत नहीं। फिर भी आप कहती हैं तो मैं ये हँसते-खेलते मेरे मायके की तस्वीर ले जाऊंगी, जो मुझे हमेशा एहसास कराएगी कि मेरी माँ भले ही नहीं है पर मायका है।
यह कहकर पारुल ने पूरे परिवार की तस्वीर उठाई और नम आँखों से सबसे विदा ली।
ये कहानी आप को कैसी लगी ओर कौन कौन अपनी बहन से प्यार करता है।

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