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    आजीवन "फकीर" की तरह रहे विक्रमादित्य पांडेय : विकास पुरुष के आंखों में था विकास का सपना



    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट:धीरज यादव 

    बलिया:-- गंवई राजनीति से सफर शुरू कर प्रदेश की सियासत में बरसों तक दमदार दखल रखने वाले समाजवादी नेता विक्रमादित्य पांडेय आजीवन 'फकीर' की तरह रहे। उनकी आंखें आखिरी पल भी विकास का सपना संजोए ही बंद हुई। उनके प्रयास से जिले में शुरू दर्जन भर विकास परियोजनाएं आज भी आधी अधूरी पड़ी है।
    वे सत्ता में रहे अथवा सत्ता से बाहर, अपनी सकारात्मक सोच की वजह से हमेशा दलीय बंधनों से मुक्त सबके चहेता व आदर्श बने रहे। "सादा जीवन-उच्च विचार" को परिभाषित करने वाले प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य पांडेय बेलहरी ब्लॉक के पिछड़े गांव बसुधरपाह में जगन्नाथ पांडेय व समरातो देवी के पुत्र के रूप में 1 जुलाई 1935 को पैदा हुए थे।  बसुधरपाह गांव बाढ़ग्रस्त व गरीबी से जूझ रहा था। इनकी पढ़ाई गांव से शुरू हुई और गोरखपुर से ऑनर्स डिग्री हासिल की। शिवपुर इंटर कॉलेज में शिक्षक रहे और बाद में शहीद मंगल पांडेय के पैतृक गांव नगवा स्थित इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्य नियुक्त हुए। किसान के पुत्र ने सामंती ताकतों के खिलाफ आवाज उठाकर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। गांव के प्रधान हुए और बेलहरी ब्लॉक प्रमुख के रूप में लगातार तीन बार चुने गए। शालीनता व मिलनसार स्वभाव के चलते बलिया सदर (अब नगर) सीट से लगातार तीन बार प्रदेश के निचले सदन में गरीबों और दबे-कुचले लोगों की आवाज बने रहे। प्रदेश सरकार में नगर विकास मंत्रालय के मुखिया रहे और अंतिम समय में उच्च सदन (विधान परिषद) के सदस्य रहे। पार्टी के प्रति निष्ठा, नेता के प्रति ईमानदारी व वफादारी तथा जनता के प्रति समर्पण ही उनकी अपनी पहचान थी। उन्होंने जीवन में कभी पैसे को महत्व नहीं दिया।
     मंत्री रहते हुए ग्रामीण इलाकों में पानी की टंकियां, दर्जनों नलकूप, सीवर योजना व शिवरामपुर घाट पर पीपा पुल बनवाए। इसके अलावा बलिया स्टेडियम व आयुर्वेद हॉस्पिटल, दुबहर विद्युत घर, बसंतपुर मे आयुर्वेदिक अस्पताल एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, नगवा में शहीद मंगल पांडेय की प्रतिमा व स्मारक, भृगु मंदिर का जीर्णोद्धार, राजकीय बालिका इंटर कॉलेज बसरिकापुर, राजकीय महिला महाविद्यालय नगवा, बसुधरपाह व नगवा गांव के विकास की योजना उनके सपनों में थी। 14 जनवरी 2007 को हमेशा के लिए सबसे दूर हो गए। उनकी अंतिम विदाई तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने स्वयं बलिया पहुंच उन्हें कंधा देकर किया।

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