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    वैकुंठ में सम्मान, अहंकार की परीक्षा और गुरु की महिमा : संतोष कुमार गुप्ता


    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
    बलिया उत्तरप्रदेश:---क्षीरसागर की अथाह शांति में भगवान श्रीहरि विष्णु शेषनाग की शैया पर विराजमान थे। उनके चरणों में माता लक्ष्मी सेवा में तत्पर थीं। चारों दिशाओं में दिव्यता और अलौकिक तेज का विस्तार था। तभी “नारायण–नारायण” की मधुर ध्वनि गूंजी और देवर्षि नारद अपने वीणा सहित वैकुंठ में प्रकट हुए।

    भगवान विष्णु ने नारद जी को देखते ही आदरपूर्वक उठकर उनका अभिनंदन किया। उन्हें श्रेष्ठ आसन दिया, प्रेमपूर्वक कुशलक्षेम पूछा और गहन आध्यात्मिक संवाद किया। ऐसा सम्मान पाकर नारद जी का हृदय आनंद से भर उठा। उनके मन में यह भाव जागा कि तीनों लोकों में उनसे अधिक प्रतिष्ठित और ज्ञानी कोई नहीं। इसी प्रसन्नता के साथ उनके भीतर अहंकार का सूक्ष्म बीज भी अंकुरित हो गया।

    जब काफी समय पश्चात नारद जी विदा लेने लगे और सभा से बाहर की ओर बढ़े, तभी भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से गंभीर स्वर में कहा,
    “देवी, जहाँ नारद अभी बैठे थे, उस स्थान को गोबर से लीपकर शुद्ध कर दो।”

    नारद जी अभी द्वार तक ही पहुँचे थे। ये शब्द उनके कानों में पड़ गए। उनका हृदय जैसे टूट गया। सम्मान के स्थान पर अपमान की अनुभूति हुई। वे तुरंत लौटे और व्यथित स्वर में बोले,
    “प्रभु! जब मैं आया तो आपने मुझे विशेष आदर दिया, और जाते ही मेरे स्थान को अपवित्र मान लिया? क्या मेरा स्पर्श अशुद्ध था?”

    भगवान विष्णु पूर्ण शांत थे। उन्होंने उत्तर दिया,
    “नारद, तुम्हारा सम्मान तुम्हारे ज्ञान और भक्ति के कारण था। किंतु जिस स्थान को शुद्ध करने को कहा गया, उसका कारण यह है कि तुम अभी गुरु-विहीन हो।”

    नारद स्तब्ध रह गए। भगवान ने आगे कहा,
    “ज्ञान, तप और भक्ति तब तक पूर्ण नहीं होते, जब तक जीवन में गुरु का आश्रय न हो। गुरु ही अहंकार का क्षय करता है। जिस व्यक्ति के भीतर ‘मैं’ जीवित हो, उसका सान्निध्य शुद्ध नहीं कहलाता।”

    नारद जी का अहंकार उसी क्षण चूर हो गया। उन्होंने दीन भाव से पूछा,
    “नाथ! अब मुझे बताइए, मैं किसे अपना गुरु स्वीकार करूँ?”

    भगवान विष्णु मुस्कुराए,
    “पृथ्वी लोक जाओ। वहाँ जो व्यक्ति सबसे पहले तुम्हें दिखाई दे, उसी को गुरु मान लेना। कोई प्रश्न मत करना।”

    नारद जी पृथ्वी पर पहुँचे। नदी के किनारे उनकी दृष्टि एक वृद्ध मछुआरे पर पड़ी, जो फटे वस्त्रों में जाल सुलझा रहा था। शरीर से मछलियों की गंध आ रही थी। नारद जी के मन में संदेह उठा—
    “यह साधारण मछुआरा मेरा गुरु कैसे हो सकता है?”

    वे बिना मिले ही लौट आए और विष्णु जी से बोले,
    “प्रभु! वह तो अज्ञानी प्रतीत होता है।”

    भगवान का स्वर कठोर हो गया,
    “नारद! तुमने मेरे आदेश की अवहेलना की। गुरु का चयन तर्क से नहीं, समर्पण से होता है।”

    लज्जित नारद पुनः पृथ्वी पर गए और मछुआरे के चरणों में झुककर बोले,
    “मैं आपको अपना गुरु बनाना चाहता हूँ।”

    बहुत आग्रह के बाद मछुआरा मान गया। परंतु गुरु बनने के बाद भी नारद के मन में संशय बना रहा। वे फिर विष्णु जी के पास गए और बोले,
    “प्रभु, वह मुझे क्या सिखा पाएगा?”

    इस बार भगवान क्रोधित हो उठे,
    “गुरु की निंदा करना महापाप है। तुम्हें 84 लाख योनियों का भ्रमण करना होगा।”

    नारद भयभीत हो गए और क्षमा याचना करने लगे। भगवान बोले,
    “अब मुक्ति का मार्ग तुम्हारे गुरु ही बताएँगे।”

    नारद तुरंत गुरु के पास पहुँचे। सारी बात सुनकर मछुआरे ने शांत भाव से कहा,
    “विष्णु जी से कहना कि वे धरती पर 84 लाख योनियों के चित्र बनाएँ। तुम उन पर लेटकर घूम लेना और कहना कि यात्रा पूरी हो गई।”

    नारद ने वैसा ही किया। भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और बोले,
    “जिस गुरु को तुम तुच्छ समझ रहे थे, वही आज तुम्हारा उद्धारकर्ता बना। यही गुरु की महिमा है।


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