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    Good Knowledge गरुड़ जी की जिज्ञासा और श्री हरि का अंतिम सत्य



    बलिया उत्तरप्रदेश
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
    बलिया उत्तरप्रदेश:---गरुड़ जी की जिज्ञासा और श्री हरि का अंतिम सत्य 
    एक बार पक्षीराज गरुड़ ने प्रभु श्री हरि के चरणों में बैठकर पूछा— "हे प्रभु! इस संसार में चौरासी लाख योनियां हैं, फिर मनुष्य जन्म श्रेष्ठ क्यों है? और इस जन्म को पाकर भी जीव दुखी क्यों रहता है? मुक्ति का वास्तविक मार्ग क्या है?"

    भगवान मन्द-मन्द मुस्कुराए और जीवन के उन छह परम सत्यों को उजागर किया, जो आज भी हर मनुष्य के लिए 'संजीवनी' समान हैं:

    १. पशु और मनुष्य में क्या अंतर है?

    प्रभु ने समझाया— "हे गरुड़! आहार (खाना), निद्रा (सोना), भय (अपनी रक्षा करना) और मैथुन (संतान उत्पत्ति)—ये चार काम तो पशु भी करते हैं और मनुष्य भी।
    यदि मनुष्य का जीवन भी केवल 'खाने-कमाने और सोने' में ही बीत गया, तो उसमें और पशु में कोई अंतर नहीं।
    मनुष्य की असली पहचान 'धर्म' है। धर्म यानी ईश्वरीय नियमों का पालन। जो मनुष्य धर्म और ईश्वर से विमुख है, वह दो पैरों वाला पशु ही है।"

    २. दुखों का अंत कैसे हो?

    "संसार में जो पापमय जीवन जीते हैं, दूसरों को पीड़ा देते हैं, उन्हें भयानक कष्ट सहने पड़ते हैं। इन कष्टों की अग्नि से बचने का केवल एक ही उपाय है— 'शरणागति'।
    जब जीव अपना अहंकार छोड़कर अपनी जीवन की डोर पूर्ण रूप से मेरे (ईश्वर के) हाथों में सौंप देता है, तब मैं स्वयं उसकी रक्षा करता हूँ।"

    ३. हमारे असली शत्रु कौन हैं?

    "बाहर के शत्रुओं से बचना आसान है, पर भीतर के शत्रु सबसे घातक हैं। काम (कामनाएं) और क्रोध—ये रजोगुण से उत्पन्न वो अग्नि हैं जो मनुष्य के विवेक को जला देती हैं। ये पतन का द्वार हैं। जब तक तुम इन पर विजय नहीं पा लेते, तब तक शांति की आशा व्यर्थ है।"

    ४. समय की रेत फिसल रही है

    प्रभु ने चेतावनी देते हुए कहा—

    "सुबह होती है, शाम होती है... उम्र यूँ ही तमाम होती है।"
    हे गरुड़! काल किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। लोग सोचते हैं कि बुढ़ापे में भजन करेंगे, लेकिन जीवन का सूर्य कब अस्त हो जाए, कोई नहीं जानता। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि समय को व्यर्थ गप्पों में न गँवाकर, उसे हरि-भजन और सत्कर्मों में लगाया जाए।

    ५. दुर्लभ अवसर मत खोना

    "यह मनुष्य देह बड़ी कठिनाई से, बड़े पुण्य-प्रताप से मिलती है। यह अनमोल है, पर क्षणभंगुर (स्थायी नहीं) है। जैसे पानी का बुलबुला कभी भी फूट सकता है, वैसे ही यह देह कभी भी छूट सकती है।

    इसलिए 'कौमार आचरेत प्राज्ञो'—

    अर्थात बचपन से, या जब जागो तभी से भक्ति का अभ्यास शुरू कर दो। यही जीवन की सार्थकता है।"

    ६. जीवन का महामंत्र (दो बातें कभी न भूलें)

    अंत में प्रभु ने सार बताया— "यदि जीव अपना कल्याण चाहता है, तो उसे दो बातें हर पल याद रखनी चाहिए:

     * पहली: मृत्यु एक अटल सत्य है, जो हर पल मेरी ओर आ रही है (ताकि संसार से मोह न हो)।

      दूसरी: श्री कृष्ण (ईश्वर) ही एकमात्र शाश्वत सत्य और सच्चा आश्रय हैं (ताकि आत्मा को शांति मिले)।"

    सार: जीवन केवल सांस लेने का नाम नहीं है, बल्कि कृष्ण के चरणों में प्रेम और धर्म के मार्ग पर चलने का नाम है।


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