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    26 जनवरी,गणतंत्र दिवस पर विशेष - विभिन्न काल खण्डों में भारतवर्ष के बदलते नामों की कहानी -डा०गणेश पाठक



    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 


     बलिया उत्तरप्रदेश:---हमारा देश विविधताओं का देश है। यह विविधता देश की भौगोलिक, धार्मिक-आध्यात्मिक एवं सामाजिक-
    सांस्कृतिक परिवेश तथा सभ्यता,
    संस्कृति,रीति-रिवाज, रहन-सहन और वेष- भूषा में देखने को मिलती है। चूंकि अपने देश की सभ्यता एवं संस्कृति अति प्राचीन है, इसलिए विभिन्न कालों में अपने देश के नाम भी भिन्न - भिन्न रूप में परिवर्तित होते रहते हैं।
    सप्तसिंधव -
         ऋग्वैदिक काल में यहां आर्यों की वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति का  उदय हो रहाथा। उस समय सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में नदियों की विशेष भूमिका होती थी। आर्यों ने जिस क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाया, उस क्षेत्र में शतुद्रि ( सतलज ), विपास ( व्यास ), परुष्णी ( रावी ), असिवनी ( चिनाव ), विवस्ता ( झेलम ), सिन्धु एवं सरस्वती नदियां बहती थीं। इन्हीं सात नदियों के नाम पर इस क्षेत्र को 'सप्तसिंधव' कहा गया तथा इस क्षेत्र के निवासियों को 'सप्तसैंधव' कहा जाता था। इसके अन्तर्गत अफगानिस्तान, पंजाब एवं तत्कालीन सम्पूर्ण आर्यावर्त का क्षेत्र आता था। ईरानी शासक इस क्षेत्र को 'सप्तहिन्दु' कहते थे।
    आर्यावर्त - 
             जब आर्यों ने अपनी सभ्यता और संस्कृति को पूरी तरह से विकसित कर अपनी पहचान बना ली तो इस क्षेत्र को 'आर्यावर्त' कहा जाने लगा। मनु के अनुसार आर्यावर्त का विस्तार हिमालय एवं विन्ध्याचल तथा पूरब एवं पश्चिम में दो समुद्रों के बीच था। इस तरह इसके अन्तर्गत कुरू, पांचाल, मत्स्य एवं सुरसेन नामकहचार जनपद थे। यह पवित्र एवं ब्रह्मर्षि देश था।
          समुद्रगुप्त के लेखों में भी आर्यावर्त का वर्णन मिलता है। कहीं - कहीं आर्यावर्त को 'उत्तरापथ' भी कहा गया है। चूंकि यह क्षेत्र विन्ध्य क्षेत्र के उत्तर में था, इसीलिए इसे 'उत्तरापथ' कहा जाता था। 'हाथीगूम्फा' के अभिलेख में 'उत्तरापथ' के कुछ राजाओं के नामों का भी वर्णन मिलता है।
    भारतवर्ष - 
             'भारतवर्ष' भी हमारे देश का एक प्राचीन जनाम है। 'वर्ष' का अर्थ होता है 'भूखण्ड'। पुराणों में सात द्वीपों का वर्णन हुआ है। प्रत्येक द्वीप में सात वर्ष ( भूखण्ड ) एवं प्रत्येक भूखण्ड ( वर्ष ) में सात नदियां एवं सात पर्वत हैं। इन सात द्वीपों में सबसे बड़ा द्वीप 'जंबू द्वीप' है,जिसे विद्वानों ने 'एशिया' महाद्वीप माना है। इस जंबू द्वीप में 'भारतवर्ष' को सबसे श्रेष्ठ देश माना गया है। 'ब्रह्मपुराण ' में इस भारवर्ष को कर्मभूमि कहा गया है। महाभारत में भारतवर्ष को 'पुण्यभूमि' कहा गया है।
          पुराणों में कहा गया है कि 'भारतवर्ष' हिमालय के दक्षिण में तथा समुद्र के उत्तर में है,जहां 'भारत' के वंशज निवास करते हैं। पुराणों भारतवर्ष के सात पर्वतों का भी वर्णन किया गया है। पुराणैं में भारत के पांच खण्डों - उत्तर देश, दक्षिण देश,पूर्व देश, पश्चिम देश एवं मध्य देश में बांटा गया है।
         ' भारत ' नामकरण कैसे हुआ, इस संबंध में पुराणों हमें वर्णित सामग्री के अनुसार 'मनु' के पुत्र थे 'भरत',जो एक अत्यन्त प्रतापी राजा थे। इन्हीं भरत राजा के नाम पर इस देश का नाम ' भारत ' पड़ा, जबकि अग्नि पुराण एवं  मत्स्य पुराण में कहा गया है कि प्रजा का भरण - पोषण करने के कारण मनु ही भरत कहलाए और इस तरह भनु भरत के नाम से ही इसे 'भारतवर्ष' कहा गया। जब कि ब्रह्मपुराण के अनुसार राजा दुष्यन्त एवं शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर अपने देश का नाम ' भारत ' पड़ा। कालिदास की रचना शाकुंतलम् में भी वर्णन आया है कि शकुंतला के पुत्र का नाम 'सर्वदमन' था, जो बाद में भरत के नाम से प्रसिद्ध हुआ और इन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम 'भारत' रखा गया। महाभारत में भी इस तरह का वर्णन मिलता है।
           स्कंद पुराण में वर्णन मिलता है कि महाराजा भरत के पूर्व इस देश का नाम  'हेमवत'एवं 'नाकिखण्ड' था।
    इंदुद्वीप - 
          जब अपने देश पर आर्यों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया तो उस समय चंद्रवंशी राजाओं का राज्य था, जो प्रसिद्धि पा चुके थे, जिसके कारण इस देश को 'इंदुद्वीप' कहा जाने लगा। 'इंदु' का अर्थ चंद्रमा होता है। चीनी यात्री का कहना है कि यह 'इंदुद्वीप' उत्तर में 'कपिस देश' से लेकर दक्षिण में ' सिंहल' तक एवं बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर के बीच फैला था।
    जंबू द्वीप - 
            कुछ विद्वानों का कहना है कि जंबू द्वीप कई देशों का समूह था।, जिसमें भारतवर्ष सबसे प्रमुख था, जबकि कुछ विद्वानों का कहना है कि जंबू द्वीप ही भारत वर्ष है। बौद्ध साहित्य में भी वर्णन हुआ है कि जंबू द्वीप भारतवर्ष का ही एक नाम है, जिसका सम्राट अशोक था।
    हिन्दुस्तान - 
              हमारे देश का  'हिन्दुस्तान'(हिन्दुस्थान) नाम प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। हिन्दुस्तान नामकरण के बारे में एक रोचक वर्णन मिलता है कि लगभग पांचवी शती ईसा पूर्व में फारस के दारा नामक राजा का शासन था। उस समय भारत के पश्चिम में एक बहने वाली महान नदी सिंधु ही भारत को फारस से अलग करती थी।  दारा सिंधु के उस पार के देश  ( भारतवर्ष ) से परिचित तो था , किंतु उसका नाम नहीं जानता था, अत: दारा ने ही सबसे पहले सिंधु के पार रहने वाले निवासियों को हिंदु कहा एवं इस स्थान को 'हिन्दुस्थान' कहा, जो बाद में 'हिन्दुस्तान' हो गया। चूंकि फारसी में ' 'स' को 'ह' कहा जाता है, इसलिए दारा ने 'सिन्धु' को 'हिन्दु' कहा होगा।
    इंडिया - 
            'हिन्दुस्तान' की तरह ही 'इंडिया' भी अपने देश का एक प्राचीन नाम है। यह नामकरण भी सिंधु नदी के नाम पर ही हुआ है। यह नाम यूनानी आक्रमणकारियों द्वारा रखा गया। तीसरी से चौथी शताब्दी में यूनानी आक्रमणकारियों ने सिंधु नदी को पार कर भारत में प्रवेश किया। उन्होंने सिंधु को 'इंडस' कहा और इस तरह 'इंडस' ( सिन्धु ) के उस पार का देश यूनानी आक्रमणकारियों के लिए 'इंडिया' हो गया और यहां के निवासियों को 'इंडियन' कहा जाने लगा। इस तरह यूनान से प्रभावित होकर पूरा यूरोपीय क्षेत्र भारत को 'इंडिया' कहने लगा और अंग्रेजों के शासन काल में तो यह 'इंडिया' नाम विशेष प्रचलित हो गया।
    भारत - 
            जब भारत अंग्रेजों की दासता से स्वतंत्र हुआ तो अपना संविधान बना और उस संविधान में अपने इस देश को अपनी पुरानी मान्यताओं के आधार 'भारत' नाम से ही पुकारा गया और समानार्थी रूप में अंग्रेजी में 'इंडिया' नाम को भी स्वीकार किया गया।
    सम्पर्क- सूत्र:
    डा०गणेशकुमार पाठक
    श्रीराम विहार कालोनी,
    माधोपुर,बलिया,उ०प्र०
    पिनकोड- 277001

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