उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश:--अजीब संयोग है, 23 मार्च को विश्व के अधिकांश देशों में 'मौसम विज्ञान दिवस' मनाने की तैयारी चल रही की जा रही थी कि उससे तीन दिन पहले ही मौसम ने उत्तर भारत में अचानक ऐसा करवट बदला कि न केवल किसानों के माने पर बल पड़ गये, बल्कि भी मौसम वैज्ञानिकों की भी चिंता बढ़ गयी। 10 मार्च के बाद गर्मी अपना रूप दिखाने लगी थी कि तभी 19 मार्च से 21 मार्च तक पश्चिमी विक्षोभ के चलते आंधी सहित तेज बारिश एवं ओलों के गिरने से खासतौर से किसान चिंतित हो गये, क्यों उनकी फसलों पर संकट के बादल मंडराने लगे।
वास्तव में वर्तमान समय में मानवीय गतिविधियों, नगरीकरण एवं औद्योगीकरण तथा तीव्र गति से हो रहे वन विनाश के चलते ग्लोबल वार्मिंग में भी तेजी से वृद्धि हो रही है , जिससे जलवायु परिवर्तन में भी तेजी आ रही है और उसका दुष्प्रभाव मौसम तथा जलवायु पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के कारण कभी भयंकर गर्मी तो कभी भयंकर शीत लहर , कभी अनावृष्टि के कारण सूखा तो कभी अति वृष्टि के कारण बाढ़ , कभी मौसम में सबको चकित कर देने वाला अचानक परिवर्तन, तो कभी वायुमंडलीय विक्षोभ, कभी ओला गिरना तो कभी घना कोहरा आदि घटनाओं ने मानव एवं मौसम वैज्ञानिकों को सोचने के लिए बाध्य कर दिया है। ये सभी घटनाएं 21 वीं सदी के प्रारम्भ से ही अपने तीव्रतम रूप में शुरू है गयी थीं और वर्तमान समय में तो इनकी तीव्रता का प्रभाव सहन सीमा को पार कर गया है। यह सब देखते हुए तो यही कहना पड़ रहा है कि 'अब यों ही बदलता रहेगा मौसम का मिजाज'।
संभवत: उपर्युक्त मौसमी एवं जलवायुविक परिघटनाओं को देखते हुए ही 23 मार्च,1950 को 'विश्व मौसम विज्ञान संगठन' की स्थापना की गयी ताकि मौसम एवं जलवायु से संबंधित तथ्यों, उसके दुष्प्रभाव एवं दुष्प्रभावों को कम करने के लिए उपाय किए जा सके। 'विश्व मौसम विज्ञान संगठन' की स्थापना की याद के उपलक्ष्य में सर्व प्रथम 23 मार्च, 1961 को सर्व प्रथम 'विश्व मौसम विज्ञान दिवस' मनाया गया और यह निर्णय लिया गया कि प्रतिवर्ष विश्व के सभी देश 23 मार्च को 'विश्व मौसम विज्ञान दिवस ' मनायेंगे, तभी से यह दिवस मनाया जाता है।
'विश्व मौसम विज्ञान दिवस' मनाने का मुख्य उद्देश्य मौसम, जलवायु एवं जल संसाधनों के महत्व के प्रति जागरूकता फैलाना है। प्रत्येक वर्ष 'विश्व मौसम विज्ञान दिवस' मनाने के लिए एक विशेष थीम रखी जाती है और उसी थीम के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर पूरे वर्ष के लिए कार्यक्रम निर्धारित किए जाते हैं। 2026 के लिए विश्व मौसम विज्ञान दिवस की मुख्य थीम "आज का अवलोकन, कल की रक्षा" रखा गया है। अर्थात् वर्तमान में जो चरम मौसमी एवं जलवायुविक परिघटनाएं घटित हो रही है,उसकी गम्भीरता का अवलोकन करते हुए एवं उसके प्रभाव को देखते हुए कल की रक्षा कैसे की जाय, इसी पर विचार - विमर्श एवं कार्यक्रम तय किए जायेंगे।
'विश्व मौसम विज्ञान दिवस' के माध्यम से हमें यह जानकारी प्राप्त होती है कि जिस वायुमंडल एवं मौसम के चक्र ने पृथ्वी पर जीवन को पनपने का सुअवसर प्रदान किया , आज मानव की भोगवादी प्रवृत्ति, विलासितापूर्ण जीवन एवं स्वार्थपरता के कारण तहस - नहस होकर ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन एवं मौसम चक्र में बदलावों के दुष्परिणाम स्वरूप विभिन्न आपदाओं को जन्म देकर हमारा विनाश करने को तत्पर है। स्थिति यह है कि हम मौसम एवं जलवायु के अंतर को भी नहीं समझ पा रहे हैं। फलस्वरूप इनके प्रभावों को समझने में भी हम समझदारी नहीं दिखा पाते हैं, जिससे उसका दुष्परिणाम भयंकर हो जाता है।
मौसम वायुमंडल की अल्पकालिक दशाओं की अवस्था को कहा जाता है, जबकि जलवायु एक लम्बी अवधि की औसत प्रवृत्ति को कहा जाता है। वर्तमान समय में मौसम एवं जलवायु दोनों में विशेष परिवर्तन हो रहा है, जो दिन प्रति दिन हानिकारक होता जा रहा है। मौसम विज्ञान दिवस इन्हीं खतरों से बचाव हेतु हमें आगाह करने , चेतावनी देने एवं खतरों से निपटने के उपायों के बारे में विभिन्न माध्यमों से रास्ता दिखाने का कार्य करता है। बदलते मौसम की चेतावनी हमारे लिए खतरे की घंटी ही नहीं, बल्कि अंतिम चेतावनी एवं अंतिम अवसर है। विश्व मौसम विज्ञान दिवस का दिन हमारे लिए संकल्पना लेने का यह अवसर प्रदान करता है कि हम भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुलगती , धधकती, जलती विनाशकारी धरती सौंपेंगे या एक हरियाली युक्त संसार छोड़ कर जायेंगे। निश्चित तौर पर हमें हरियाली से ओत - प्रोत धरती छोड़कर जाना होगा, अन्यथा आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।
वर्ष 2026 में विश्व मौसम विज्ञान दिवस के उपलक्ष्य में कृषि एवं पर्यावरण विभाग द्वारा एक दस्तावेज जारी कर स्थानीय निकायों एवं इकाईयों से अनुरोध किया गया है कि विश्व मौसम विज्ञान दिवस, 2026 के महत्व, उद्देश्य, एवं विषय का प्रचार - प्रसार करने हेतु सार्वजनिक क्षेत्रों सड़कों, एजेंसी मुख्यालयों एवं अन्य उपयुक्त स्थानों पर पर्यावरण के अनुकूल सामग्री से पोस्टर, बैनर आदि प्रदर्शित किया जाय और जन - जागरूकता फैलाई जाय। प्रत्येक नागरिकों का यह कर्तव्य है कि हम ऐसा कोई कार्य न करें , जिससे ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा मिले तथा वायुमंडलीय विक्षोभों में वृद्धि हो और जलवायुविक तथा मौसमी अस्थिरता उत्पन्न हो, जिसके फलस्वरूप जलवायु परिवर्तन की स्थिति पैदा हो। अन्यथा हमारा विनाश अवश्यंभावी हो जायेगा।
यदि हमें अस्थिर मौसम एवं जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचना है तो हमें अपनी जीवन की कार्यशैली को बदलना होगा। हमें भारतीय संस्कृति के अनुरूप जीवन शैली अपनानी होगी। हमारी संस्कृति अरण्य संस्कृति रही है। हमारे यहां प्रकृति के पांच मूलभूत तत्वों - क्षिति, जल, पावक, गगन एवं समीर को भगवान के रूप में पूजा करने की परम्परा रही है। इस परम्परा क हमें पुनः पालन करना होगा। पृथ्वी को हरा - भरा बनाना होगा। पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक धरती के 33 प्रतिशत भाग को वृक्षों से आच्छादित करना होगा, जिसके लिए मुहिम बनाकर जन - जन को पौधारोपण करना होगा। जल संसाधनों को येन - केन प्रकारेण संरक्षण करना होगा,जंगलों को कटने से बचाना होगा, तभी हम जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बच सकेंगे। अन्यथा 'हम ही शिकारी , हम ही शिकार' वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी और हम अपना विनाश अपने आंखों के सामने हो होते देखते रह जायेंगे और अंततःकुछ नहीं कर पायेंगे।

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