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    3 मार्च, विश्व वन्य जीव दिवस पर विशेष -


    भारतीय चिन्तन परम्परा एवं आधुनिक विचारों के समन्वय से ही किया जा सकता है वन-वृक्ष एवं वन्य जीवों का संरक्षण - डाॅ० गणेश  पाठक  

    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
    बलिया उत्तरप्रदेश:-- भारतीय चिन्तन परम्परा एवं भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा अनादि काल से ही चली आ रही है। भारतीय संस्कृति प्राकृतिक अनुराग एवं प्रकृति संरक्षण की चिन्तन धारा है। भारतीय चिन्तन परम्परा में प्रकृति प्रेम इस कदर समाया एवं रचा-बसा है कि प्रकृति से जुदा अस्तित्व की बात हम सोच भी नहीं सकते हैं। हमारे ऋषि- मुनि इतने उच्च कोटि के मनीषी थे कि वे जड़- चेतन सभी तत्वों के संरक्षण के विधान बनाए हैं। भारतीय मनीषियों ने सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियों को ही आराध्य माना है और उनके संरक्षण की अवधारणा प्रस्तुत की है।
       खासतौर से वन - वृक्ष संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण एवं पौधारोपण के संदर्भ में यदि हय भारतीय वाॅंग मय में प्रस्तुत अवधारणाओं को हम देखें तो पाते हैं कि हमारी संस्कृति में यह बात कही गयी है कि "वृक्ष देवो भव" अर्थात वृक्ष देवता होते हैं। इसी अवधारणा को लेकर वेदों, पुराणों, स्मृतियों, धर्म- अध्यात्म ग्रंथों, रामायण, महाभारत एवं अन्य प्राचीन ग्रंथों में वन संरक्षण की बातें भरी पड़ी हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान के अनुसार विश्व में कोई भी वनस्पति ऐसी नहीं है ,जो औषधीय न हो। संभवतः इसी लिए "श्वेताश्वर उपनिषद" में वृक्षों को साक्षात ब्रह्म के समान मानते हुए कहा गया है कि- "वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकः।
       वृक्षों को पुत्र से भी उच्च स्थान देते हुए एक वृक्ष को दस पुत्र के बराबर माना गया है :-
    "मत्स्य पुराण" में भी उल्लेख आया है कि- " दश कूप: समा वापी, दश वापी समा हृद। दश हृद समा पुत्रो, दश पुत्रो समा वृक्ष। अर्थात् दस कुओं के बराबर एक वाबड़ी,दस वाबड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाब के बराबर एक पुत्र एवं दस पुत्र के बराबर एक वृक्ष होता है।
    वृक्षों के प्रति ऐसा प्रेम एवं अनुराग शायद ही किसी अन्य देश की संस्कृति एवं चिन्तन परम्परा में मिलता हो, जहा वृक्ष को पुत्र से भी उच्च दर्जा दिया गया है एवं उनकी पूजा की जाती है।, वहा वृक्षों की काटने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती। किन्तु अंधाधुंध विकास एवं विलासितापूर्ण जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वनों का बेरहमी से विनाश किया गया और पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे हमारी बदलती सोच ने वृक्षों के संरक्षण के प्रति हमें उदासीन बना दिया।
    पूजनीय माना गया है वृक्षों को :-
      वृक्षों को हमारे यहां सदैव से ही पूजनीय माना गया है और "भामीनि विलास" नामक ग्रंथ में कहा गया है कि-"धत्ते भरं कुसुमपत्रफला वली नां धर्मव्यथां,वहाति शीत भवा रूजश्च। यो देहमर्ययति चान्यसुखस्य हेतोस्तसमै,वादाव्य गुरवे तस्ये नमोस्तुते।" अर्थात् जो वृक्ष फूल, पत्ते एवं फलों के बोझ को उठाए हुए धूप की गर्मी एवं शीत की पीड़ा को सहन करता है  एवं दूसरों के सुख के लिए अपना शरीर अर्पित कर देता है, उस वंदनीय श्रेष्ठ वृक्ष को नमस्कार है।
    ब्रह्म स्वरूप माना गया है वृक्षों को :-
      " नृसिंह पुराण" में वृक्ष को ब्रह्मस्वरूप मानते हुए कहा गया है कि- "एतद् ब्रह्म परं चैव, ब्रह्म वृक्षस्य तस्य तव।" 
    सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं वृक्ष :-
        जातक कथाओं में तो वृक्षों को हमारी सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाले कल्पवृक्ष के रूप में माना गया है,यथा- "सर्व कामदाः वृक्षा:।
         रामायण एवं महाभारत में वृक्षों को सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है :-
       महाभारत एवं रामायण में कल्पवृक्षों का विवरण प्रस्तुत किया गया है। महाभारत के भीष्म पर्व में वृक्षों को सभी मनोरथों को पूरा करने वाला माना गया है,यथा- "सर्वकामदाः फलाः वृक्ष।" महाभारत के ही आदि पर्व में किसी गांव के अकेले फले- फूले वृक्ष को चैत्य के समान पूजनीय माना गया है-
    " एको वृक्ष हियो ग्रामे भवेत पर्ण कलान्वितः, चैत्यो भवति निज्ञांतिर्चनीयः संपूजितः।"  
    वृक्षों में माना गया है विष्णु का वास :-
       "स्कन्द पुराण" में उल्लेख आया है कि वृक्षों में विष्णु का वास होता है, यथा-"एको हरिः सकल वृक्षगतो विभाति।" 
      अथर्ववेद में पीपल के वृक्ष को देव सदन कहा गया है-
    "अश्वत्थः देवसदनः।"
       लगाए गये वृक्ष अगले जन्म में संतान के रूप में प्राप्त होते हैं :-
    'विष्णु धर्म सूत्र' में कहा गया है कि प्रत्येक जन्म में लगाए गये वृक्ष अगले जन्म में संतान के रूप में प्राप्त होते हैं।
     'चाणक्य नीति' में उल्लेख आया है कि एक वृक्ष से वन उसी प्रकार सुन्दर लगता है , जिस प्रकार अकेले पुत्र से कुल, यथा- 
    "एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगंधिना, वासितं स्याद वन सर्व सुपुत्रेण कुलं यथा।" 
        वृक्ष लगाने पर नरक से मिलती है मुक्ति :-
      'वाराहपुराण' में कहा गया है कि जो व्यक्ति पीपल, नीम या बरगद का एक, अनार या नारंगी का दो , आम के पांच एवं लताओं के दस वृक्ष लगाता है वह कभी नरक में नहीं जाता है।यथा- 
     अस्वस्थमेकं पिचुमिन्दमेकं,व्यग्ग्रेषमेकं दसपुष्पजाती। द्वे- द्वे दाडिम मातुलुंगे पंचाग्ररोपी, नरकं न याति।" 
     जिस घर में तुलसी का पौधा होता है ,उस घर में यमदूत भी नहीं आते हैं :-
       तुलसी के पौधे को घर के प्रत्येक आंगन में लगाने की बात करते हुए कहा गया है कि जिस घर में तुलसी की नित्य पूजा की जाती है,उस घर में यमदूत भी नहीं आते हैं, यथा- " तुलसी यस्य भवने तत्यहं परिपूज्ये, तद्गृहं नोवर्सन्ति कदाचित यमकिंकरख।" 
    वृक्षों को काटने को अपराध माना गया है :- 
    विष्णु धर्म सूत्र, स्कंद पुराण एवं याज्ञ्वल्क्य स्मृति में भी वृक्ष के काटने को अपराध माना गया है और जो वृक्ष काटता है, उसके लिए राजा द्वारा दण्ड का विधान बनाया गया है। 
     जैन एवं बौद्ध साहित्य में भी मिलता है वन संरक्षण हेतु वन महोत्सव का विवरण :-
         जैन एवं बौद्ध साहित्य में वन यात्राओं एवं वृक्ष महोत्सवों का मनोहर वर्णन किया गया है, जो वन - वृक्षों एवं  पशु- पक्षियों के संरक्षण की उद्दात्त भावना से ही प्रेरित है.।सुँगकुषाण कला में एवं सिन्धु घाटी की सभ्यता में भी वृक्ष पूजा के चित्र अंकित हैं।
          जहां तक वन्य जीव संरक्षण की बात है तो हमारे भारतीय संस्कृति में जीवों को मारना पाप माना गया है। यह अवधारणा जीवों के संरक्षण के प्रति हमारी उदात्त भावना को प्रकट करती है। संभवत: जीवों के संरक्षण को दृष्टिगत रखते हुए ही सभी हिंसक ,अहिंसक, विषधर तथा छोटे एवं बड़े सभी प्रकार के जीव जंतुओं को देवी - देवताओं का वाहन बना दिया गया है, ताकि उन जीवों को कोई नुक़सान न पहुंचा सके एवं उनका संरक्षण हो सके। उल्लेखनीय है कि हमारे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में वन - वृक्षों एवं वन्य जीवों की विशेष भूमिका होती है।
    भारतीय चिन्तन परम्परा के अनुशीलन से ही सम्भव हैं वन एवं वन्य जीव का संरक्षण :-
      भारतीय चिन्तन परम्परा एवं भारतीय संस्कृति में वन संरक्षण की अवधारणाएं कूट- कूट कर भरी हैं। आज आवश्यकता है पुनः इन अवधारणाओं का अनुपालन करते हुए वनों एवं वृक्षों को अधिक से अधिक रोपित करने तथा अपने पुत्र के समान, बल्कि उससे भी बढ़ कर उन्हें सुरक्षित एवं संरक्षित करने की, तभी हम पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखते हुए अपने जीवन के लिए एवं भावी पिढ़ी को भी सुरक्षित वातावरण दे सकते हैं। किंतु इसके लिए आवश्यक है इन अवधारणाओं में निहित बातों को जन-जन से अवगत कराने की ताकि आम जनता इन तथ्यों समझे, इसके महत्व को समझते हुए वनों एवं वृक्षों को लगाने तथा उसे सुरक्षित एवं संरक्षित करने में अपना अहम् योगदान प्रदान करे।
         वर्तमान समय में वन - वृक्ष एवं वन्य जीवों के हो रहे विनाश एवं उनके विलुप्ति को ध्यान में रखते हुए ही विश्व के वनस्पतियों एवं वन्य जीवों के बारे में जागरूकता में वृद्धि करने तथा उनके संरक्षण हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 दिसम्बर, 2013 को अपने 68 वें सत्र में अपने प्रस्ताव यू एन 68 / 205 में 3 मार्च , 1973 हुए "जंगली जीव एवं वनस्पतियों की लुप्त प्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कन्वेंशन" को "विश्व वन्य जीव दिवस" के रूप में मनाने का दिन घोषित करने का निर्णय लिया, जिसे थाईलैंड द्वारा विश्व के वन्य जीवों एवं वनस्पतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने एवं संरक्षण करने हेतु प्रति वर्ष 3 मार्च को "वन्य जीव दिवस" मनाने हेतु प्रस्ताव पारित किया। तभी से प्रति वर्ष 3 मार्च को संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों द्वारा पूरे विश्व में वन्य जीव दिवस मनाया जाता है।
    File photo of गणेश पाठक (पर्यावरणविद्)
         उल्लेखनीय है कि   विश्व में लगभग 50, 000 वन्य प्रजातियों द्वारा अरबों लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है तथा प्रत्येक पांच में से एक व्यक्ति अपने भोजन एवं आय हेतु जंगली पौधों एवं कवक पर निर्भर रहते हैं। विश्व स्तर पर औषधीय एवं सुगंधित प्रयोजनों हेतु उपयोग की जाने वाली लगभग 9 प्रतिशत पादप प्रजातियां अत्यधिक कटाई  पर्यावास के विनाश, जलवायु परिवर्तन औषधि व्यापार के चलते विलुप्ति के कगार पर हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक आंकलन के अनुसार विश्व के लगभग 1.6 अरब लोग आजिविका हेतु जंगलों पर निर्भर हैं। लगभग 3 अरब लोग ऊर्जा के मुख्य स्रोत के तौर पर जंगलों फर निर्भर रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम के वर्ल्ड माॅनिटिरिंग सेंटर के अनुसार तीव्र गति से समाप्त हो रहे जंगलों के कारण जीव - जंतुओं की 8000 हजार प्रजातियां खतरे में हैं, जिनमें से 976 प्रजातियां तो विलुप्त होने के कगार पर हैं।
          संभवत: उपर्युक्त तथ्यों को देखते हुए ही इस वर्ष 2026 में विश्व वन्य जीव दिवस की मुख्य थीम  " औषधीय एवं सुगंधित पौधे , स्वास्थ्य, विरासत तथा आजीविका का संरक्षण" रखा गया है, जिसके तहत सी आई टी ई ई एस के नेतृत्व मैं 'विश्व वन्य जीव दिवस, 2026' में वन्य जीवों की रक्षा हेतु अनेक जागरूकता कार्यक्रम एवं अभियान चलाए जाने का निर्णय लिया गया है, जिसके द्वारा मानव स्वास्थ्य, सांस्कृतिक विरासत एवं स्थानीय आजीविका को कायम रखने में पौधों को महत्वपूर्ण भूमिका पर विशेष प्रकाश डाला जायेगा एवं पर्यावास की क्षति , वन विनाश एवं जलवायु परिवर्तन से इन पौधों पर बढते दबावों को प्रकाश में लाकर उनके संरक्षण हेतु जन जागरूकता पैदा की जायेगी। किंतु इस आधुनिक एवं वैज्ञानिक सोच के साथ - साथ यदि भारतीय वाॅंगमय में उल्लिखित अवधारणाओं को भी   सम्मिलित कर एवं समन्वय स्थापित पर वन - वृक्षों एवं वन्य जीवों के संरक्षण हेतु कदम उठाएं जाएं , तो शायद वन वृक्षों एवं वन्य जीवों को बचाए रखने में हम अहम् भूमिका निभा सकेंगे।

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