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    गुगल एवं विकीपीडिया के युग में पुस्तकों एवं पुस्तकालयों का महत्व - डाॅ० गणेश पाठक (पर्यावरणविद्)




    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट: हिमांशु शेखर 
             

    बलिया उत्तरप्रदेश:--वर्तमान समय में  ई पुस्तक,ई पुस्तकालय, आंन लाइन पुस्तकालय एवं डिजिटल पुस्तकालय का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है और लोगों में यह धारणा बनती जा रही है कि पुस्तकालय अ अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। लेकिन ऐसी बात नहीं है। कारण कि ई पुस्तकालय, आंनद लाइन पुस्तकालय एवं डिजिटल पुस्तकालयों को तो सामग्री तो पुस्तकालयों से ही मिलती है, और अनुवाद करने के चक्कर में यदा - कदा सामग्री गलत भी हो जाती है।
          पुस्तकालय सदैव से ही न केवल शिक्षा जगत , बल्कि समुदाय एवं समाज के लिए उपयोगी रहे हैं। क्योंकि इन पुस्तकालयों से हमें न केवल साक्षरता, बल्कि आजीवन सीखने की प्रक्रिया भी मिलती है, जिससे हमारे व्यक्तित्व का विकास होता है।
          पुस्तकालय एक ऐसा स्थान है , जहां लोग नई रूचियों एवं जानकारियों की खोज करते हैं। जो अन्यत्र संभव नहीं है।इन पुस्तकालयों में हमें पाठ्य पुस्तकों से लेकर शोध की पुस्तकें, पत्र - पत्रिकाएं , शोध जर्नल ,संदर्भ ग्रंथ एवं अन्य प्रकार की पुस्तकें प्राप्त होती हैं, जिनसे हमें अद्यतन जानकारी प्राप्त होती रहती है और हमारी बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होती रहती है। पुस्तकालयों में हम बैठ पर पढ़ भी सकते हैं एवं नियमानुसार पुस्तकें घर पर भी बढ़ने के लिए ले जा सकते हैं।
          यदि देखा जाय तो पुस्तकालयों से हमें निम्नांकित लाभ प्राप्त होते हैं-
    *शैक्षिक विकास - 
              शिक्षा में पुस्तकालयों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जहां शैक्षिक विकास के लिए संसाधन प्राप्त होते हैं।
    *व्यावसायिक दृष्टिकोण एवं रोजगार की प्राप्ति -
           पुस्तकालयों का व्यवसायिक महत्व भी है। पढ़ाई के साथ - साथ छात्र बी लिव, एम लिव , नेट एवं पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त कर रोजगार भी प्राप्त कर सकते हैं।
    *पुस्तकालय ज्ञान का भण्डार होते हैं, जहां विभिन्न विषयों पर पुस्तकें उपलब्ध हो सकती हैं।
    *पुस्तकालयों से शिक्षा एवं साक्षरता को बढ़ावा मिलता है।
    *पुस्तकालयों से अल्प व्यय अथवा नि: शुल्क अध्ययन सामग्री मिल जाती है।इस तरह पुस्तकालय सस्ता एवं सुलभ होते हैं।

    File photo of:डा गणेश पाठक (पर्यावरणविद्)

    *आधुनिक युग में पुस्तकालय डिजिटल समावेश के केंद्र हैं। जहां इंटरनेट, कम्प्यूटर एवं डिजिटल साक्षरता पर प्रशिक्षण भी दिया  जाता है , जिससे डिजिटल विभाजन को रोका जा सकता है।
    पुस्तकालय सामाजिक एवं सांस्कृतिक बोध के केंद्र होते हैं, जो समुदाय के लोगों को परस्पर जोड़कर सामाजिक समरसता एवं स्वस्थ मनोरंजन का साधन उपलब्ध कराते हैं।
    *पुस्तकालय शोध एवं अन्वेषण के केंद्र होते हैं, जहां शोध एवं अन्वेषण हेतु संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं।
         इस प्रकार स्पष्ट है कि पुस्तकालय ज्ञान, शिक्षा एवं संस्कृति का ऐसे केंद्र होते हैं , जहां सभी आयु वर्ग एवं आय वर्ग के के लिए सस्ता एवं सुलभ ज्ञान उपलब्ध कराते हैं। पुस्तकालय एकाग्रता में वृद्धि करने , आजीवन सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ाने एवं डिजिटल शिक्षा एवं साक्षरता प्रदान करने में अहम् भूमिका निभाते हैं, जिससे पुस्तकालय का उपयोग करने वाले लोगों के व्यक्तित्व विकास , समाज को समृद्धि प्रदान करने एवं सामाजिक समरसता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार पुस्तकालय आज भी  शिक्षा एवं समाज के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं एवं भविष्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।

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