उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: हिमांशु शेखर
बलिया उत्तरप्रदेश:--गर्भाधान संस्कार के सही प्रयोग द्वारा मनोनुकूल सन्तान की प्राप्ति सम्भव है। किन्तु इसके लिये दम्पती को संयमित जीवन बिताना पड़ता है।
“प्राण” बना है “प्र + अन्” से, जिसका मूल अर्थ है “श्वास लेना”। भ्रूण माता के रक्त से ऑक्सीजन प्राप्त करता है, फेफडों का स्थूल विकास हो जाने पर भी स्वतन्त्र रूप से श्वास नहीं लेता। फेफडे हों या न हों, बिना ऑक्सीजन के जीवन सम्भव नहीं। गर्भाधान होते ही ऑक्सीजन की आवश्यकता हो जाती है। गर्भ के अमुक मास में जीव को प्राण मिल गया और उससे पहले प्राणहीन जीव था इस बात का क्या अर्थ है?
गर्भ से निकलने को जन्म नहीं कहते। नाड़ा कटने पर शिशु स्वतन्त्र रूप से श्वास लेता है तब उसका “जन्म” होता है, उसी काल से जन्म्कुण्डली बनानी चाहिये। आजकल पाश्चात्य प्रभाव के कारण लोग शास्त्रीय अवधारणाओं को समझने का प्रयास नहीं करते।
प्रकृति और पुरुष के संयोग को “जीव” कहते हैं। जीव अनादि काल से है, और मोक्ष मिलने तक है। इस अन्तराल में जब−जब वह जन्म लेकर श्वास लेता है तब−तब “प्राणी” कहलाता है। पेड़−पौधे भी श्वास लेते हैं। किन्तु आधुनिक विज्ञान को पता नहीं है कि पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र आदि भी श्वास लेते हैं।
वीर्यपात को आजकल पुंसत्व माना जाता है। वीर्यपात असुरत्व है। कामवासना के कारण वीर्यपात होता है। कामवासना रहित सन्तानोत्पत्ति हेतु गर्भाधान यज्ञ अनिवार्य है, तब वीर्य स्थूल रूप ग्रहण किये बिना सन्तान उत्पन्न करता है और ब्रह्मचर्य खण्डित भी नहीं होता। गर्भाधान यज्ञ के बिना भी सन्तानोत्पत्ति के उपाय हैं, जैसे कि सीता की तरह हल्या अथवा गौतम पत्नी अहल्या।
एक पुरुष ६००० बार वीर्यपात कर सकता है, यह अधिकतम सीमा है जहाँ तक पँहुचने से पहले ही नपुंसकता छा जाती है। हर वीर्यपात पर टेलोमेर का एक खण्ड टूटता है जिस कारण प्रजाति की आयु नष्ट होती है, वंशक्रम टूट जाता है। वंशक्रम को जो टूटने न दे उसे “सन्तान” कहते हैं। अतः जिसका वीर्य शुद्ध हो उसी को सन्तान कह सकते हैं, कामुक सन्तति वंश को तान नहीं पाती।
लगभग २० वर्ष की आयु में सामान्य पुरुष का स्थूल पुरुषत्व अधिकतम रहता है, उम्र बढ़ते रहने पर सीधी रेखा में गिरता जाता है। यदि मान लें कि ८० वर्ष में शून्य हो तो इसका अर्थ हुआ कि शत प्रतिशत से शून्य होने में ६० वर्ष लगे, तो ३० वर्ष पश्चात अर्थात् ५० वर्ष की अवस्था में ५०% स्थूल पुरुषत्व बचेगा। ४००० बार वीर्यपात करने पर व्यवहारिक तौर पर नपुंसकता की प्राप्ति होती है।
शुद्ध वीर्य चैतन्यता है, स्थूल वस्तु नहीं है। शुद्ध वीर्य ही आत्मा है।
द्रष्टा अपने दर्शककेन्द्र में स्थित न रहकर दृश्य में वि−स्तृत हो जाय तो उसे “स्त्री” कहते हैं।
हर मनुष्य में स्त्री और पुरुष है। एक सीमा से अधिक हो तो स्थूल देह भी वैसा ही होगा।
सनातन धर्म वीर्यपात की अनुमति विवाहित पुरुष को भी नहीं देता। बिना वीर्यपात के गर्भाधान करना चाहिये। श्रीकृष्ण ने महाभारत में विवाहित अर्जुन को ब्रह्मचारी बताया और अविवाहित अश्वत्थामा को ब्रह्मचारी नहीं कहा, जिस कारण अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र पूरा सीख न सका और स्वयं भी पतित हुआ ।

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