उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट: धीरज यादव/हिमांशु शेखर
बलिया:-- अतीत की ओर झांकने एवं इतिहास पढ़ने से पता चलता है कि मेरा देश सदियों से गुलाम था। हिंदुस्तान में अंग्रेजी साम्राज्य का बोलबाला था। अंग्रेजों के सामने नतमस्तक होकर चलना पड़ता था। जिस किसी ने अंग्रेजों के खिलाफ बोलने की हिम्मत की, उसकी बोली, गोली से दबा दी जाती। मां बहनों की सरेआम इज्जत लूटकर स्तन भी कटवा लिए जाते। भरा-पुरा हिंदुस्तान उजाड़ हो चला था। यही नहीं?, अंग्रेजों ने एक दूसरे के विरुद्ध लड़ाकर उखाड़ फेंका था। सारे हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाने के लिए जाल फैला दिए गए थे। शिक्षा में सर्वश्रेष्ठ देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाए रखने के पक्के इरादे बांध लिए थे। ऐसी स्थिति में विद्रोह की आवश्यकता थी।
"विरोध वही करता है, जो खून बहाने को तैयार रहता है।"
अंग्रेजों के इन इरादों पर विद्रोह का जो पहला हथोड़ा पड़ा वह बलिया का ही था। गाय और सूअर की चर्बी से बने कारतूस दांत से खींचकर चलाने की खबर आग में घी डालने जैसी थी। 29 मार्च 1857 को बलिया की माटी का वीर सिपाही मंगल भड़क उठा और बैरकपुर छावनी के परेड ग्राउंड में ही अपने साथियों को विद्रोह के लिए ललकारा। अंग्रेजों भारत छोड़ो, के नारों से पूरा बैरकपुर छावनी का परेड ग्राउंड गुंज उठा। ठीक उसी समय अंग्रेज सार्जेंट मेजर 'ह्यूसन' ने मंगल पांडेय को गिरफ्तार करने के लिए सिपाहियों को आदेश दिया। यह सुनकर मंगल का खून खौल उठा। उनकी बंदूक गरजी और सार्जेंट मेजर ह्यूसन वहीं लुढ़क गया। उसी समय घटनास्थल पर लेफ्टीनेंट 'बाॅब' अपने घोड़े पर सवार होकर आया। मंगल पांडेय की बंदूक चली और घोड़े सहित बाॅब मारा गया। इतने में एक और अफसर उठा और पिस्तौल निकालकर मंगल पर गोली चलाई पर निशाना चूक गया। मंगल तुरंत अपनी तलवार निकाली और एक ही वार में उसका भी काम तमाम कर दिया।
क्रांति आगे बढ़ चली। बगावत की खबर पाते ही कुछ गोरे सैनिकों को लेकर कर्नल हिअर्सी तथा अफसर कर्नल व्हीलर तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए। आदेश दिया कि सिपाही मंगल पांडेय को गिरफ्तार कर लो। लेकिन बागी बलिया का वीर बघेला मंगल बलि लेने को नहीं, आहुति देने को तैयार था। मंगल पांडेय ने खुली बगावत न देखकर गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वयं अपनी बंदूक को अपनी छाती से लगाकर दाग ली गोली। लेकिन वह मरे नहीं। उन्हें अस्पताल भेजा गया और वे स्वस्थ हो गए।
मंगल पांडेय की वीरता से अंग्रेज भी चकित थे। मुकदमा चला, फौजी अदालत में उनसे पूछा गया, तुमने जो कुछ किया वह अपनी मर्जी से किया था या किसी के उकसाने पर। इस पर मंगल का जवाब था- *"मैने जो कुछ भी किया वह राष्ट्र और धर्म के लिए किया। अंग्रेजों से मेरा कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं।" छः अप्रैल की शाम को साढ़े छः बजे मंगल पांडेय को अदालत ने दोषी ठहराया। "34 नंबर देसी पैदल सेना की 19वीं रेजीमेंट की पांचवी कंपनी के 1446 नंबर के सिपाही मंगल पांडेय" को 8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर के परेड ग्राउंड में ही फांसी के फंदे पर झूला दिया गया। उस समय सभी भारतीयों ने दिल में धधकती आग को दबाये अपने वीर सपूत को अश्रुपूरित विदाई दी। इस प्रकार वे भारतीय स्वतंत्रता के महानायक (अग्रदूत) बन गए।
34 नंबर रेजीमेंट के सारे सिपाही मंगल पांडेय के भक्त थे और उनके फांसी से उद्वेलित थे। छः मई 1857 को 34वीं इन्फेंट्री सेना को विधिवत भंग कर दिया गया। उन सैनिकों से हथियार लेकर बदन से वर्दी उतार ले गई। उधर निकाले गए सिपाही अपने-अपने गांव एक संकल्प लेकर लौट रहे थे, और इधर पूरे देश में हजारों-हजार मंगल तैयार हो रहे थे। 10 मई को मेरठ व 11 मई को दिल्ली में भड़का विद्रोह 15 अगस्त सन् 1947 को देश आजाद कराकर ही शांत हुआ।
स्वतंत्रता के प्रेरणास्रोत शहीद मंगल पांडेय का जन्म "30 जनवरी 1831 ईस्वी को तत्कालीन गाजीपुर जनपद की बलिया तहसील के नगवा गांव में हुआ था। इस गांव का जनपद आज बलिया है। मंगल पांडेय के पिता का नाम स्वादिष्ट पांडेय एवं माता का नाम जानकी देवी था। मंगल पांडेय, गिरवर पांडेय और ललित पांडेय ये तीन भाई थे। छोटे भाई ललित पांडेय की शादी हुई थी। इनके दो पुत्र महावीर पांडेय व महादेव पांडेय हुए। आज भी उनके वंशज बंधुचक (नगवा), बलिया में हैं।
बलिया ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश के धरोहर हैं मंगल पांडेय
*दुबहर:-- शहीद मंगल पांडेय के पैतृक गांव नगवा निवासी, पूर्व प्रधान चंद्रकुमार पाठक ने कहा कि अपने प्राणों की आहुति देकर भारत की आजादी का अलख जगाने वाले मंगल पांडेय को समूचा राष्ट्र उनकी जयंती 30 जनवरी एवं पुण्यतिथि 8 अप्रैल पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर उन्हें नमन करता है। लेकिन स्वतंत्र भारत की सरकारें शहीदे आजम मंगल पांडेय की गरिमा के अनुरूप उनके पैतृक गांव को तथा उनके स्मारक का समुचित आधुनिक तरीके से सुव्यवस्थित नहीं कर पाई। जिसका यहां के लोगों को हमेशा खेद रहता है। स्थानीय लोग अपने महापुरुष के याद में उनसे जुड़ी स्मृतियों को आधुनिक तरीके से विकसित करने की मांग हमेशा करते रहे हैं। श्री पाठक ने कहा कि मंगल पांडेय बलिया ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश के धरोहर हैं। उनके जुनून और जज्बे को अपनाना होगा तभी हम लोगों की उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मंगल पांडेय के विचारों को जन-जन तक पहुंचाकर जागरूक करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि
दुबहर:-- 30 जनवरी 1831 को नगवा, बलिया में जन्मे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक शहीद मंगल पांडेय ने अपने राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए 8 अप्रैल 1857 को हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चुमकर प्राणों की आहुति दे दी। सोए भारत को जगाने वाले मंगल पांडेय ने अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध जो आवाज उठाई, उसकी गूंज किसी न किसी रूप में अब भी हमारे समाज में सुनाई पड़ती है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि लोग शहीदों की कुर्बानियों को भूलते जा रहे हैं।
मंगल पांडेय विचार सेवा समिति के प्रवक्ता एवं सामाजिक चिंतक बब्बन विद्यार्थी ने कहा कि बलिया की अस्मिता, परंपरा, संस्कृति और यहां की माटी की खुशबू बरकरार रखने के लिए युवाओं में अपने राष्ट्र के प्रति देशभक्ति का जज्बा पैदा करना होगा। वहीं, साहित्यकारों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, गायक व गीतकारों को शहीद के नाम कविता, कहानी, लेख, नाटक व गीतों के माध्यम से श्रद्धा एवं आस्था के प्रतीक मंगल पांडेय के विचारों को जन-जन तक पहुंचाकर जागरूक करना होगा। यदि हम समर्पण भाव से इतना कर सके तो यही शहीद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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