उत्तर प्रदेश बलिया
इनपुट:धीरज यादव
बलिया:-- जो इंसान अपने राष्ट्र और दूसरों के लिए सोचता है, और कुछ करता है, उसी व्यक्ति का इतिहास लिखा जाता है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 का बिगुल फूकने वाले मंगल पांडेय को 8 अप्रैल 1857 को फांसी के फंदे पर झूला दिया गया। बागी बलिया के इस वीर सपूत की देशभक्ति से हर कोई प्रभावित था। रोचक तथ्य यह है कि इनकी फांसी एक दिन टल गई थी, क्योंकि जल्लादों ने ऐसा करने से मना कर दिया था।
30 जनवरी 1831 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गाजीपुर जनपद, बलिया तहसील के गंगा तीरी गांव नगवा में जन्में मंगल पांडेय पश्चिम बंगाल अंतर्गत बैरकपुर छावनी में 34 नंबर देसी पैदल सेना की 19वीं रेजीमेंट की पांचवी कंपनी के 1446 नंबर के फौजी सिपाही थे। इस बालक में शुरू से ही धार्मिक विचार एवं देश भक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरे थे।
हिंदुस्तान में अंग्रेजी साम्राज्य का बोलबाला था। अंग्रेजों के अत्याचार से जनता कराह रही थी। ऐसी स्थिति में विद्रोह की आवश्यकता थी। अंग्रेजों के अत्याचार से भारतीय सैनिक उद्वेलित थे। इसी बीच मंगल पांडेय को पता चला कि जो कारतूस हम दांत से खींचकर चलाते हैं, वह गाय और सूअर की चर्बी से तैयार होती है। यह घटना आग में घी का काम किया। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में अचानक मंगल भड़क उठा और अपने साथियों को क्रांति के लिए ललकारा। बैरकपुर छावनी अंग्रेजों के सिपाहियों द्वारा घेर ली गई। आहुति देने को तैयार मंगल ने सार्जेंट मेजर ह्यूशन और लेफ्टिनेंट बाॅब को मौत के घाट उतारकर क्रांति की शुरुआत कर दी।
मंगल पांडेय पकड़े गए और उनके ऊपर मुकदमा चला। छ: अप्रैल 1857 को फौजी अदालत में मंगल पांडेय को राजद्रोह एवं बगावत का दोषी करार देते हुए उन्हें फांसी देने का आदेश दिया गया। 7 अप्रैल को फांसी देने के लिए दो जल्लादों को बुलाया गया, लेकिन उन्होंने सूली पर चढ़ाने से इनकार कर दिया। क्योंकि मंगल पांडेय की देशभक्ति के जल्लाद भी कायल थे। दोबारा कोलकाता से जल्लाद बुलाए गए और 8 अप्रैल 1857 को प्रातः 5:30 बजे बैरकपुर छावनी के परेड ग्राउंड में उन्हें फांसी दे दी गई। बैरकपुर छावनी से उठी क्रांति की चिंगारी 1942 में शोला बनकर धधक उठी। 10 मई को मेरठ व 11मई को दिल्ली में भड़का विद्रोह 15 अगस्त 1947 को देश आजाद कराकर ही शांत हुआ। आज भले ही मंगल पांडेय हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी राष्ट्रभक्ति, साहस व बलिदान हमेशा नहीं पीढ़ी को प्रेरणा देता रहेगा।
क्रांति गीत:--
सोए भारत को जगाय दियो रे मंगल मर्दनवा।
कारतूस वाली बात बन गइली शोला,
छावनी में चले लागल गोली-गोला,
क्रांति के दियनवा जलाय दियो रे मंगल मर्दनवा।
बैरकपुर छावनी के मंगल सिपाही,
केतने फिरंगियन के कई दिहले घाही,
ह्यूशन और बाॅब को मिटाय दियो रे मंगल मर्दनवा।
हिंदू पुकारे गईया मोरी माई,
सूअर हराम ह मुसलमा के भाई,
दोनों धरमवा बचाय लियो रे मंगल मर्दानवा।
जानकी देवी, सुदिष्ट पांडेय के ललनवा,
फांसी पर चढ़ गइले देश के करनवा,
राष्ट्रभक्ति धारा बहाय दियो रे मंगल मर्दनवा।
धन्य माई बाबू, धन्य नगवा की माटी,
हिंद के सपूत बागी बलिया के खाॅटी,
आन, बान, शान को बढ़ाय दियो रे मंगल मर्दानवा।
*(गीतकार-बब्बन विद्यार्थी)*

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