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    सिर्फ नारे गढ़ने से अविरल तथा निर्मल नहीं होगी पतित पावनी : रमाशंकर तिवारी


    उत्तर प्रदेश बलिया 
    इनपुट:धीरज यादव 

    दुबहर, बलिया:--गंगा का मूल दर्द संस्कृति को उपभोग एवं व्यवसाय में बदलने से पैदा हुआ है। पतित पावनी, साफ करने का ढोल पीटने से अविरल तथा निर्मल नहीं होगी। उसे जनक्रांति चाहिए और ईमानदारी भी। उक्त बातें गंगा मुक्ति एवं प्रदूषण विरोधी अभियान के प्रणेता रमाशंकर तिवारी ने रविवार को दुबहर विकासखंड के सरबहनपुर गांव में गंगा के अंतर्कथा विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कही।
    उन्होंने कहा कि गंगा का निर सिर्फ नारे गढ़ने से निर्मल नहीं होगा। कठिन निर्णय ही गंगा की हिफाजत करेंगे। गंगा की तिजारत संस्कृति पर खतरे की घंटी है। इसकी गूढ़ और गंभीर रहस्य को समझना होगा। संगोष्ठी की अध्यक्षता भूगोलविद् डॉक्टर हरेंद्रनाथ यादव तथा संचालन अधिवक्ता कुलदीप दुबे ने किया।
     इस अवसर पर त्रिवेणी दुबे, बालेश्वर दुबे, ऋषि कुमार, अभय कुमार दुबे, उमेश राजभर, गोपाल गुप्त, रवि कुमार, बजरंगी, रजनीश गुप्त, अमन गुप्ता, निखिल यादव आदि उपस्थित रहे।

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